-राजेश बैरागी-
दो दिन पहले ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी कह रहे थे कि अब यूपीसीडा काला पानी नहीं रहा है, वहां भी आमदनी की फसल लहलहा रही है। उनकी यह टिप्पणी नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यीडा में आने के लिए होने वाली जोर आजमाईश को लेकर थी। उनकी बात में दम भी था, क्योंकि कुछ समय पहले ग्रेटर नोएडा, नोएडा के लिए हुए स्थानांतरण को यूपीसीडा के कुछ कर्मियों ने नकार दिया था। परंतु आज जारी हुई एक और तबादला सूची ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यूपीसीडा में चाहे जितनी बहार आ गई हो, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यीडा के आकर्षण में कोई कमी नहीं आई है। दरअसल इन तीनों प्राधिकरणों से यूपीसीडा या अन्य औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में तबादला एक प्रकार की सजा मानी जाती है। हालांकि गिर पड़े तो हर-हर गंगे की तर्ज पर अधिकारी कर्मचारी यही कहते हैं कि उन्हें तो नौकरी करनी है, सरकार जहां चाहे वहां करा ले। परंतु तबादला रुकवाने और इन्हीं तीन प्राधिकरणों में से किसी एक में नियुक्ति पाने के लिए पर्दे के पीछे किए जाने वाले कठोर प्रयासों से कौन अनजान है।यूपीसीडा जाकर मात्र चार महीने में वापसी किसी गलती का सुधार नहीं है, यह अधिकारी कर्मचारी के भागीरथ प्रयासों का परिणाम होता है। इस सीजन में अब तक सौ से अधिक लोगों को इधर से उधर किया जा चुका है। बताया गया है कि पिछले लगभग दो माह से लखनऊ के कुछ खास दरवाजों पर इन प्राधिकरणों में कार्यरत लोगों की भीड़ कम नहीं हो रही थी। औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में अंतर तबादलों का आज आखिरी दिन था। इसके बाद अति आवश्यक होने पर माननीय मुख्यमंत्री की अनुमति से ही तबादला किया जा सकेगा। हालांकि पिछली तारीखों के कुछ आदेश अगली तारीखों में अभी भी आ सकते हैं।इन तबादलों से क्या हासिल होगा? प्राधिकरणों के कामकाज पर निगाह रखने वाले एक पत्रकार ने कहा कि इससे कार्यप्रणाली में सुधार होता है। हालांकि हर वर्ष और चार चार महीने में होने वाले तबादलों से कैसे कार्यप्रणाली सुधर सकती है, इस प्रश्न का जवाब उसके पास भी नहीं था।(नेक दृष्टि)
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