उपद्रव के बाद शांति के लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों की झड़ी, क्या श्रमिकों की रोटी कपड़ा और मकान की समस्या का होगा समाधान?


-राजेश बैरागी-
गत 13 अप्रैल को नोएडा में हिंसक उपद्रव के बाद श्रमिकों और उद्यमियों के बीच फंसे शासन और प्रशासन द्वारा किए जा रहे प्रयास क्या स्थाई साबित होंगे? जिलाधिकारी मेधा रूपम ने इस घटना को इस औद्योगिक जनपद के लिए खतरे की घंटी मानते हुए श्रमिकों के हित में कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कराई हैं। बड़ी संख्या में स्वास्थ्य शिविर लगवाए जा रहे हैं।तीनों प्राधिकरण नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यीडा श्रमिक आवास बनाने की घोषणा कर रहे हैं तो कमिश्नरेट पुलिस उपद्रवियों पर सख्त कार्रवाई करने के साथ उद्यमियों और श्रमिकों के बीच पुरानी शांति बहाली के लिए प्रयास कर रही है।इसके बावजूद श्रमिकों के जीवनयापन के लिए आवश्यक रोटी कपड़ा और मकान की समस्या का क्या कोई स्थाई समाधान खोजा जा रहा है? मैंने दो दिन पहले जिलाधिकारी का श्रमिकों को उपलब्ध कराए जा रहे पांच किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडर की गैस की दर को लेकर ध्यान आकर्षित किया। यह 100 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से दी जाती है। यही दर ऊंचे मुनाफे के साथ खाना बेचने वाले होटल और रेस्टोरेंट को दिए जाने वाले वाणिज्यिक सिलेंडर की है। क्या दोनों एक समान हैं? क्या शासन प्रशासन को श्रमिकों को दिए जा रहे छोटे सिलेंडर की गैस घरेलू गैस की दर पर उपलब्ध नहीं करानी चाहिए जबकि छोटे सिलेंडर में दबाव कम होने से श्रमिक पूरी गैस का उपभोग भी नहीं कर पाते हैं। अब तीनों प्राधिकरणों द्वारा श्रमिकों के लिए बनवाए जाने वाले आवासों पर विचार करते हैं।ये आवास 30 और 35 वर्गमीटर में बनाने की बात की जा रही है और इनकी कीमत साढ़े तीन लाख से नौ लाख रुपए होगी। क्या कोई प्रवासी श्रमिक 21 प्रतिशत वृद्धि के साथ न्यूनतम वेतन 13-14 हजार रुपए में इतनी कीमत पर आवास खरीदने का सपना भी देख सकता है जबकि उसे पेट भरने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है। नोएडा जैसे शहर में पीने का पानी भी खरीदना पड़ता है। एकीकृत औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरणों की स्थापना का क्या यही उद्देश्य रहा होगा? पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पहले औद्योगिक शहर मोदीनगर में मोदी घराने ने उद्योग लगाने के साथ श्रमिकों के लिए विशाल और सुव्यवस्थित कॉलोनियां भी बनाईं।उन कॉलोनियों में श्रमिकों को न्यूनतम किराए पर आवास उपलब्ध कराए गए।मोदीनगर 1933 में बसाया गया था। नोएडा 1976 में, ग्रेटर नोएडा 1991 में और यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण 2001 या 2008 में स्थापित हुए। इनके नीति निर्माताओं ने श्रमिकों को विकास के खांचे में कहां रखा? क्या उन्हें पटना, गोरखपुर, कोलकाता, भोपाल, राजस्थान से रोजाना यहां आकर काम करने के बाद वापस चले जाने की तुगलकी योजना रही। किसी भी ऐसी घटना के बाद शासन प्रशासन शांति प्रयासों के तहत कुछ ऐसे उपक्रम करता है जो कल्याणकारी होते हैं।इन प्रयासों की आयु घटनाओं के शांत होने तक होती है। स्थाई प्रयास या तो किए नहीं जाते या प्रशासनिक कार्रवाई में फंसकर इतने लंबे हो जाते हैं कि अगले आंदोलन की तिथि आ जाती है।(नेक दृष्टि)

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