_-राजेश बैरागी-_
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद तल्ख टिप्पणी में उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग करने की बात कही है। क्या पुलिस के अभाव में देश के किसी भी हिस्से में नागरिक सुरक्षा की कल्पना की जा सकती है? सदियों से चली आ रही पुलिस व्यवस्था नागरिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य होने से अधिक आदत बन गई है। हमें पुलिस व्यवस्था में रहने की आदत है। छोटे मोटे झगड़ों से लेकर आतंकी घटनाओं तक में हमारी निर्भरता पुलिस पर बनी हुई है। संभवतः अधिकांश लोग इसलिए नहीं लड़ते झगड़ते हैं कि उन्हें पुलिस कार्रवाई का भय रहता है। पुलिस कार्रवाई का अर्थ हम आसानी से समझते हैं कि पग पग पर और लंबे समय तक पुलिस, हवालात,जेल और अदालतों के झंझटों से गुजरना। नागरिकों के बीच शांति बनाए रखने के लिए अनिवार्य पुलिस व्यवस्था को भंग करने जैसी बात सर्वोच्च न्यायालय ने क्यों कही होगी? क्या पुलिस अपनी भूमिका को सही से नहीं निभा रही है? इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पुलिस कानून द्वारा निर्धारित उसके कर्तव्यों को धता बता रही है?दुनिया भर में पुलिस एक भ्रष्ट विभाग के तौर पर बदनाम है। कहीं की पुलिस थोड़ी अच्छी हो सकती है परंतु भ्रष्ट होना उसका चरित्र बन गया है। ऐसा इसलिए हुआ है कि प्राथमिक स्तर पर पुलिस को ऐसी शक्तियां प्राप्त हैं जिनका सदुपयोग और दुरुपयोग उसकी इच्छा पर निर्भर है। यहीं से पुलिस के भ्रष्ट होने और गैरकानूनी कार्य करने की प्रवृत्ति का जन्म होता है। इसपर सत्तारूढ़ राजनीतिक लोगों का अपने निजी और राजनीतिक हितों के लिए पुलिस के दुरुपयोग से स्थिति और भी विकट हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस मामले में पुलिस को भंग कर देने जैसी तल्ख टिप्पणी की,वह एक महिला के साथ आपराधिक वारदात करने वाले व्यक्ति को मौके से हिरासत में लेने के बावजूद एफआईआर में आरोपी को अज्ञात दर्ज करने से संबंधित है। संबंधित थानाध्यक्ष ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या वह आरोपी को बिना जांच बचाने की योजना के तहत ऐसा कर रहा था? इससे अपराध को कैसे रोका जा सकता है जिसके लिए पुलिस व्यवस्था कायम की गई है? पुलिस के लिए एक कहावत कही जाती है कि पुलिस रस्सी को सांप बना देती है। क्या पुलिस सांप को रस्सी भी बना देती है? सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी को इसी संदर्भ में लिया जाना चाहिए।(नेक दृष्टि)
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