_-राजेश बैरागी-_
हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की उदारता यही है कि कोई भी उन्हें मानने और पूजने से मना कर सकता है। उनके अस्तित्व को लेकर प्रश्न किए जा सकते हैं। उनके भौंडे,अश्लील और उपहास उड़ाने वाले चित्र बनाए जा सकते हैं। यह सुविधा किसी और धर्म, संप्रदाय या पंथ के देवी-देवताओं,नबी, संदेशवाहक या प्रवर्तक के लिए नहीं है।न जाने कितने आक्रांत आए,न जाने कितनी हुकुमतों ने हिंदू धर्म के देवी-देवताओं को नकारा। कुछ लोगों ने खुद को बुतश्किन कहलाने में फख्र महसूस किया। गजनी ने सोमनाथ के मंदिर में घुसकर गदा के प्रहार से शिवलिंग को चोट पहुंचाई।बी सत्यनारायण रेड्डी ने अपने ‘जय सोमनाथ’ शीर्षक से उपन्यास में लिखा कि शिवलिंग तोड़ने के बाद गजनी के चेहरे पर विजयी भाव उभर आया था। गजनी कहां है? औरंगजेब कहां है? हिंदू धर्म और उसके प्रतीकों को नष्ट करने वाले और दूसरे लोग कहां हैं? क्या हिंदू धर्म के देवी-देवताओं को नकारने, उन्हें न पूजने की घोषणा करने वाले लोग गजनी और औरंगजेब को उचित मानते हैं? यह प्रश्न ऐसे लोगों को खुद सोचने समझने के लिए छोड़ देते हैं। बात धम्म की करते हैं। ऊपर से जब कोई नीचे गिरता है तो धम्म की आवाज सुनाई देती है। धम्म की आवाज से कुछ टूटने या टकराने का अनुभव होता है। धम्म की दीक्षा क्या टूटने या टकराने की दीक्षा है? स्वयं को श्रेष्ठ समझने में कोई दोष नहीं परंतु किसी को गलत ठहराकर स्वयं को श्रेष्ठ बताना धम्म से गिरने के समान है।जो भी ऐसी दीक्षा ले या ऐसे दीक्षा कार्यक्रम में शामिल हो, उसके पतन के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होता है। धम्म हालांकि पतन के लिए नहीं बनाया गया था परंतु यदि गिरने के लिए धम्म का उपयोग किया जाए तो इसमें धम्म का क्या दोष?(नेक दृष्टि)
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