नेपाल: हत्या और राष्ट्रीय संपत्ति को जलाकर विरोध प्रदर्शन 

राजेश बैरागी।क्या विरोध प्रदर्शन के लिए सरकारी/राष्ट्रीय सम्पत्ति को नष्ट करना अनिवार्य होता है? पिछले तीन दिनों में नेपाल में जो कुछ हुआ, उसे तमाम कारणों के बावजूद उचित नहीं ठहराया जा सकता है। वहां एक पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी की जलाकर हत्या करने की जघन्य घटना के अलावा भी अनेक ऐसी घटनाएं हुई हैं जो विरोध प्रदर्शन से अलग थीं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पर्दों पर चल रही तस्वीरों में से एक में एक प्रदर्शनकारी भूमि पर पड़े एक बैनर को ही पीटता दिखाई दे रहा था। यह जनाक्रोश का विस्फोट हो सकता है परन्तु इससे आंदोलन करने या कराने वालों की मानसिकता को भी आसानी से समझा जा सकता है।वहां के संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री के कार्यालय, मंत्रियों के घरों और विपक्षी नेताओं तथा सरकार के सहयोगी दलों के नेताओं के घरों को न केवल आग के हवाले कर दिया गया बल्कि नेताओं के साथ बुरी तरह मारपीट भी की गई। वहां की के पी शर्मा ओली सरकार का दो दिन के आंदोलन से ही पतन हो गया। आशंका है कि भारत के इस पहाड़ी पड़ोसी देश में आगामी दिनों में सैन्य शासन लागू हो सकता है। यदि वहां काठमांडू के मेयर बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हो भी जाता है तो भी शासन चलाने में सेना ही मुख्य भूमिका में रह सकती है।के पी शर्मा ओली की सरकार का गिरना भारत के लिए लाभकारी ही है। इस सरकार के पतन में अमेरिका की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।जिन 26 सोशल मीडिया एप्स पर प्रतिबंध को नेपाल में हुए इस भीषण विरोध प्रदर्शन का कारण माना जा रहा है,वह एक बहाने से अधिक नहीं है। नेपाल एक ऐसे बफर राष्ट्र जैसा है जो राजनीतिक रूप से पंगु तो है ही, अपनी नीतियों को लेकर भी पंगु ही है।कल और आज हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन से नेपाल एक राष्ट्र के तौर पर बहुत पीछे चला गया है जबकि उसे आगे बढ़ने में ही लंबा समय लगना था। बहरहाल इस अवसर पर मुझे महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्मरण हो रहा है। हालांकि विदेशी शक्तियों से वित्त पोषित एनजीओ और दूसरे समूहों के द्वारा उन्हें दिए गए लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आक्रामक और हिंसक आंदोलन ही अनुकूल बैठते हैं। महात्मा गांधी के आंदोलन करने के तौर तरीकों से न तो अब कोई सहमत है और न किसी में उतना धैर्य ही बचा है।(

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