प्राधिकरणों में चक्कर लगाते भूमि मुआवजे के सवाल


-राजेश बैरागी-
मुख्य कार्यपालक अधिकारी का जनता दरबार चल रहा था। यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) के अबसे पहले मुख्य कार्यपालक डॉ अरुणवीर सिंह और वर्तमान मुख्य कार्यपालक अधिकारी राकेश कुमार सिंह की यह विशेषता उल्लेखनीय है कि सुबह कार्यालय शुरू होने से लेकर शाम तक यदि कोई बैठक न चल रही हो तो जनता दरबार चलता रहता है। इससे दूरदराज और विलंब से आने वाले लोगों को एक निश्चित समय में ही अधिकारी से मिलने को लेकर कोई संदेह नहीं रहता है। हालांकि ग्रेटर नोएडा और नोएडा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी भी कार्यालय में मौजूद होने पर आमतौर पर किसी से भी मिलने से परहेज़ नहीं करते परंतु यमुना प्राधिकरण में सीईओ से मिलना ज्यादा सरल होता है। जनता दरबार में आया एक व्यक्ति प्राधिकरण क्षेत्र के एक गांव का किसान था। प्राधिकरण ने उसकी भूमि अधिग्रहीत कर ली है। उसने बताया कि उसे मूल मुआवजे के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला है। उसके खेतों पर पेड़, बोरिंग आदि परिसंपत्तियां भी थीं। नियमानुसार अधिग्रहण के दौरान भूमि पर किसान की परिसम्पतियों की भी सूची तैयार की जाती है और उनका भी मुआवजा दिया जाता है। किसानों को मूल मुआवजा आमतौर पर शीघ्रता से भुगतान किया जाता है परंतु अतिरिक्त मुआवजा, आबादी आवासीय भूखंड और परिसंपत्तियों के भुगतान में प्राधिकरण और जिला प्रशासन की सुस्ती बेमिसाल हो जाती है। मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने उस किसान को समझाया कि क्षेत्र के विकास के लिए उनका सहयोग आवश्यक है और उन्हें इन मुद्दों पर विकास कार्यों में बाधा उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। उन्होंने तत्काल संबंधित अधिकारियों को फोन पर उस किसान के शेष मुआवजे का भुगतान शीघ्रता से कराने का आदेश भी दिया। वह किसान एक लेखपाल पर मुआवजा भुगतान प्रक्रिया में जानबूझकर बाधा उत्पन्न करने का आरोप भी लगा रहा था। हालांकि वह कुकुरमुत्तों की भांति उग आए एक तथाकथित किसान संगठन से भी जुड़ा था, इसलिए उसके आरोपों की सत्यता संदिग्ध हो सकती है। इसके विपरीत प्रश्न यह है कि एक किसान या किसानों को अपनी भूमि के मुआवजे को प्राप्त करने के लिए मुख्य कार्यपालक अधिकारी तक क्यों पहुंचना चाहिए? प्राधिकरणों के गठन के आधी सदी बाद भी किसान और प्राधिकरणों के संबंध संशय से भरे क्यों हैं? उनकी भूमि लेकर उन्हें मुआवजा भुगतान करने में हीलाहवाली क्यों की जाती है? हालांकि मुख्य कार्यपालक स्तर के अधिकारी के समक्ष आने पर अधिकांश मामले निपट ही जाते हैं परन्तु उनके समक्ष आने की आवश्यकता ही क्यों होती है? अधेड़ हो चुके प्राधिकरणों में भी इस प्रश्न की जवानी बरकरार बनी हुई है।(नेक दृष्टि)

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