
_-राजेश बैरागी-_
कभी समाजसेवा के लिए प्रारंभ हुई राजनीति की यात्रा आजीविका की देहरी तक आ पहुंची है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी में 2017 में एक व्यापारी नेता प्रमोद कुमार निगम की हत्या के दोषी और आजीवन कारावास भुगत रहे नंदलाल राय उर्फ बबलू राय की दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाते हुए इस आधार पर जमानत दे दी है कि उसे आगामी विधानसभा चुनाव में चुनाव लड़ना है और चुनाव लड़ना आजीविका के अधिकार जितना महत्वपूर्ण है। हालांकि उच्च न्यायालय के न्यायधीश द्वय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और विनय कुमार द्विवेदी की इस टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट को अवश्य गौर फरमाना चाहिए जिसकी राय अंतिम और अधिक महत्व वाली हो सकती है। क्या नेतागिरी आजीविका के लिए की जाती है? शायद ही कोई राजनेता इस प्रकार की स्वीकारोक्ति करता हो। उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने राजनेताओं की इस वास्तविकता को उजागर कर अच्छा ही किया है परंतु क्या अपनी सजा और अपराध को चुनौती देने वाला नंदलाल राय उर्फ बबलू राय भी यह कहने का साहस कर सकता है कि मैं आजीविका के लिए चुनाव लड़ना चाहता हूं। यह घिनौना सत्य है कि नेतागिरी केवल आजीविका का ही साधन नहीं है बल्कि यह धनकुबेर बनने और जनता के हितों पर डाका डालने का भी सबसे मुफीद साधन बना हुआ है।गली मुहल्ले से लेकर राष्ट्र के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं के बारे में आम जनता की राय यही है। यह पर्दे के पीछे की जाने वाली वेश्यावृत्ति जैसी है जिसमें स्त्री और पुरुष समान रूप से अनैतिक होने के बावजूद सामान्य और नैतिक दिखने का ढोंग करते हैं।कवि राजेन्द्र राजन इससे भी आगे बढ़कर इन्हें भिखारी, मदारी और जुआरी तक कहते हैं। हालांकि यह तीनों उपक्रम भी रोजगार यानी आजीविका से ही संबंधित हैं। नेता को बेरोजगार क्यों होना चाहिए?उसे भी रोजगार करने का वैसा ही अधिकार है जैसा अन्य सभी लोगों को है और वह इस अधिकार का उपयोग तमाम मिल, कारखाने, निजी अस्पताल, होटल ,जुआघर आदि लगाकर करता भी है। आपत्ति है तो बस उसके राजनीति को मुनाफे का रोजगार बना लेने से। आपत्ति यह भी है कि वह इसे रोजगार नहीं जनसेवा कहता है।(नेक दृष्टि)
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