आंदोलनों के विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के प्रयोग का औचित्य

-राजेश बैरागी-_

एमबीबीएस चिकित्सक और झोलाछाप डॉक्टर में क्या अंतर होता है? दोनों रोगों की पहचान के आधार पर चिकित्सा करते हैं परन्तु झोलाछाप डॉक्टर को दवा की सही मात्रा मालूम नहीं होती है। क्या गौतमबुद्धनगर कमिश्नरेट पुलिस आंदोलन के दौरान होने वाली हिंसा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संकट में अंतर को लेकर झोलाछाप डॉक्टर के स्तर पर प्रशिक्षित है?गत अप्रैल में नोएडा में हुए हिंसक श्रमिक आंदोलन के लिए गिरफ्तार दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में निरुद्ध करने को लेकर उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा गौतमबुद्धनगर कमिश्नरेट पुलिस और जिलाधिकारी के रवैए पर की गई टिप्पणी पुलिस प्रशासन के अधिकारों को लेकर एक गंभीर बहस की मांग करती है। कोई भी कानून उसके उपयोग और परिणाम पर आधारित होता है। आंदोलन करने वाले श्रमिक हों या छात्र, बेरोजगार युवा हों या विपक्षी राजनीतिक दल, उनके उग्र होने पर की जाने वाली निरोधात्मक कार्रवाई कानून की अधिकता से प्रेरित नहीं होनी चाहिए। यदि पुलिस या प्रशासन किसी नागरिक या नागरिकों के समूह को अधिकतम प्रताड़ित कर भविष्य में होने वाले विरोध या असहमति का बीज नाश करने का इरादा रखते हैं तो यह लोकतंत्र और लोकतांत्रिक देश में संभव नहीं है। इसके लिए किसी और शासन पद्धति को अपनाना होगा जिसमें नागरिक अपनी आवाज उठाने की हैसियत न रखते हों। इस मामले में जिलाधिकारी का दोष इतना भर है कि उन्होंने पुलिस के रासुका के प्रस्ताव पर अपनी संस्तुति प्रदान कर दी। वो उस प्रस्ताव को लौटा भी सकती थीं। परंतु कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था वाले जनपदों में यह थोड़ा मुश्किल हो गया है। पुलिस को विवेक से काम लेना चाहिए, एक छात्रा के लिए रासुका का इस्तेमाल करते समय तो यह और भी आवश्यक हो जाता है। उच्च न्यायालय की टिप्पणियों का सार यही है कि लोकतांत्रिक देश को पुलिस स्टेट बनाने के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।(नेक दृष्टि)

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