नोएडा प्राधिकरण:जल सीवर लाइनों की पांच करोड़ से मरम्मत! 

राजेश बैरागी।यह संयोग मात्र है या नोएडा प्राधिकरण का दुर्भाग्य कि इस अत्याधुनिक शहर की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत जल आपूर्ति और सीवरेज विभाग की कमान ऐसे अभियंताओं के हाथों में रहती है जो अयोग्य और अनुभवहीन होते हैं। वर्तमान में जल सीवर विभाग का नेतृत्व कर रहे महाप्रबंधक राघवेन्द्र प्रताप सिंह इलेक्ट्रीकल इंजीनियर हैं जबकि उनके मातहत उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) से स्थानांतरित होकर आए अभियंताओं को इस प्रकार के एकीकृत औद्योगिक शहर में जल आपूर्ति और सीवरेज सिस्टम का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है। इसीलिए शहर में दशकों से जल सीवर की नई लाइन डालने तथा चार दशक पुरानी लाइनों को दुरुस्त रखने की कोई योजना नहीं बनाई जा सकी है।
जल आपूर्ति और सीवरेज व्यवस्था सिविल इंजीनियरिंग का विषय है। प्राधिकरण की शुरुआत में सभी सिविल निर्माण और जल सीवर को मुख्य परियोजना अभियंता (सिविल) की सदारत में सिविल इंजीनियरों द्वारा संपादित किया जाता था। शहर का आकार बढ़ने के साथ जल एवं सीवर विभाग को अलग कर मुख्य अनुरक्षण अभियंता का पद सृजित किया गया। इस पद पर एसपीएस चौहान और पी एच सिद्दीकी जैसे सिविल इंजीनियर नियुक्त रहे। एसपीएस चौहान को नोएडा शहर की जल सीवर व्यवस्था का जनक माना जाता है। उनके समय में ही यमुना किनारे रैनीवैल बनाने की शुरुआत हुई जिससे शहर के लोगों की जलापूर्ति की आवश्यकता को पूरा किया जा सका। चूंकि यह पद मोटी आमदनी का पद बन गया था।जल और सीवर लाइन बिछाने और रखरखाव के अदृश्य कामों में मेनपावर, डीजल, क्लोरीन, बिलों के संशोधन,जल सीवर कनेक्शन देने जैसे कामों में अंधाधुंध कमाई के रास्ते खोज लिए गए थे। इसलिए इस पद पर योग्यता के स्थान पर पहुंच को महत्व दिया जाने लगा। लंबे समय तक जल और सीवर विभाग के प्रमुख रहे यादव सिंह इलैक्ट्रीकल इंजीनियर थे। वर्तमान महाप्रबंधक जल एवं सीवर भी इलेक्ट्रीकल इंजीनियर ही हैं। उनके पास प्राधिकरण के इलैक्ट्रीकल एंड मेंटेनेंस विभाग भी है जबकि जल और सीवर स्वयं एक पूर्णकालिक महाप्रबंधक सिविल का विभाग है। उनके मातहत अधिकांश अभियंता यूपीसीडा से स्थानांतरित होकर आए हैं।यूपीसीडा में इस प्रकार एकीकृत औद्योगिक शहर की जल सीवर व्यवस्था प्रदान करने का कल्चर नहीं है। एक वरिष्ठ अभियंता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि दशकों पुरानी जल सीवर लाइनों को बदलना बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए जहां भी लीकेज या टूट फूट पता चलती है तो मरम्मत कार्य कर देते हैं। दरअसल यह एक अभियंता की मानसिकता का परिचायक है। केवल मेंटेनेंस के नाम पर बिल फाड़ने से ही करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हों तो किसी को नई लाइनें बिछाने की योजना बनाने की क्या आवश्यकता है। अयोग्यता इस आलस्य की मुख्य वजह बन जाती है

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