मायावती का अविवाहित महिला होने का रंज

_-राजेश बैरागी-_

क्या उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती जीवन के 71 वें वर्ष में अपने महिला और अविवाहित होने के कारण स्वयं को असुरक्षित अनुभव करने लगी हैं? उन्होंने हाल ही में मीडिया के समक्ष आकर एक ऐसा बयान दिया है जिससे उनका अकेले पड़ जाने का भय तो झलकता ही है बल्कि सत्ता शीर्ष पर पहुंची जीवट स्वभाव की एकांकी जीवन जीने वाली महिला नेत्रियों के राजनीति से परे वास्तविक जीवन के कड़वे सच को उजागर कर दिया है।आम भारतीय के जीवन में विवाह और वैवाहिक सुख का क्या स्थान है? विवाह एक आदत है या जरूरत या दोनों? दरअसल 71 वें वर्ष में चल रहीं पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती ने हाल ही में यह कहा है कि लड़की होने और अविवाहित होने के कारण उन्हें अपने भाई भतीजों को साथ लेना पड़ा था। यह एक ऐसा बयान है जिसने सत्ता के शीर्ष पर पहुंची महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके जीवट एकांकी जीवन का बेहद कमजोर पक्ष उजागर कर दिया है। क्या ममता बनर्जी और स्व जयललिता भी अपने बूते सत्ता हासिल करने के बावजूद महिला और अविवाहित होने के कारण असुरक्षा की भावना से घिरी रही हैं? मायावती ने स्व कांशीराम के नेतृत्व में दलित राजनीति को तथा दलित हितों को जिन ऊंचाइयों तक पहुंचाया,वह अभी तक का सर्वोच्च स्तर माना जाता है। उन्होंने चार बार उत्तर प्रदेश सरकार का नेतृत्व किया जिसमें 2007 में तो अपने बूते पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अब से पहले उन्हें देखकर कभी नहीं लगा कि वो अबला हैं और अविवाहित होने के कारण अपने भाई भतीजों पर आश्रित हैं। उन्हें आमतौर पर आयरन लेडी के तौर पर जाना जाता रहा है। परंतु भतीजे आकाश आनंद और उसके ससुर सिद्धार्थ गौतम को लेकर मायावती ने जिस प्रकार बार-बार फैसले बदले हैं, उससे लगता है कि बसपा और मायावती दोनों की स्थिति डांवाडोल है। मायावती ने अन्य राजनीतिक दलों और खासतौर पर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भांति बसपा की बागडोर अकेले अपने हाथों में रखी है और अपने उत्तराधिकारी के लिए दूसरी पंक्ति के लोगों को जन्म ही नहीं लेने दिया। मायावती का महिला और अविवाहित होने का बयान आगामी विधानसभा चुनाव में अपने समर्थकों के लिए एक भावनात्मक पैंतरा भी हो सकता है। हालांकि इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि भारतीय समाज में अभी भी विवाह और वैवाहिक जीवन न केवल एक आदत है बल्कि एक अनिवार्य जरूरत भी है। परंतु बसपा सुप्रीमो को यह अहसास बहुत विलंब से हुआ है।(नेक दृष्टि)

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