
-राजेश बैरागी-
इतिहास बताता है कि जब चीन अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था,उसी समय जापान ने उसके समक्ष कठोर 21 मांग रख दीं।मध्य एशिया में तनाव और युद्ध के बीच नोएडा जैसे औद्योगिक शहर में चार दिनों से चल रहा श्रमिकों का विरोध प्रदर्शन कुछ ऐसा ही है। निर्यातक औद्योगिक इकाइयों की हालत पस्त है और ईंधन तेल व गैस की कमी से भी औद्योगिक इकाइयों में पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पा रहा है। गैस तेल की किल्लत से श्रमिक भी पलायन कर गए हैं जिससे स्थिति और भी खराब हो गई है। ऐसे में श्रमिकों द्वारा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने से हालात और खराब ही होंगे। हालांकि विरोध प्रदर्शन तेज होते ही गौतमबुद्धनगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने श्रम विभाग के साथ मिलकर श्रमिकों तथा उद्यमियों से वार्ता कर हालात पर काबू पाने का प्रयास किया परन्तु वेतन वृद्धि को लेकर अभी भी पेंच फंसा हुआ है। श्रमिक न्यूनतम वेतन 20 हजार रुपए से कम पर राज़ी नहीं हैं।आज भी श्रमिकों के आंदोलन के दृष्टिगत जिलाधिकारी ने उद्योगपतियों संग बैठक की।खास बात यह है कि श्रमिकों का यह आंदोलन केवल नोएडा फेज दो क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों में ही है। नोएडा के शेष औद्योगिक क्षेत्रों तथा गाजियाबाद व सिकंदराबाद या ग्रेटर नोएडा में अभी तक शांति बनी हुई है। इस आंदोलन का नेतृत्व भी कोई बड़ा श्रमिक संगठन नहीं कर रहा है। दरअसल हरियाणा सरकार द्वारा अपने राज्य में श्रमिकों के वेतन में पैंतीस प्रतिशत की वृद्धि करने का असर यहां भी पहुंच गया है। हालांकि श्रमिकों के अड़ियल रवैए तथा वैश्विक परिस्थितियों में नोएडा जैसे औद्योगिक शहर में औद्योगिक उत्पादन ठप्प होने का संकट उत्पन्न हो गया है।(नेक दृष्टि)
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