_-राजेश बैरागी-_
गौतमबुद्धनगर जिला न्यायालय में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष की योग्यता खारिज होने के बाद अध्यक्ष बनने के सपने देखने वालों में कुछ न्यायिक अधिकारी भी शामिल हो गए हैं।ये वो न्यायिक अधिकारी हैं जो सेवानिवृत्त होने के बाद राज्य की न्याय व्यवस्था की सहायता के लिए अपने सेवानिवृत्त पद से निचले पद पर तदर्थ नियुक्ति के तहत सेवा दे रहे हैं। बीते कल जिला न्यायालय में बार अध्यक्ष की योग्यता उत्तर प्रदेश बार कौंसिल द्वारा खारिज किए जाने के उपलक्ष्य में कहीं जश्न मनाया जा रहा था तो कहीं आक्रोश व्याप्त था। इस माहौल में न्यायालयों में कामकाज होना तो संभव है नहीं जबकि सामान्य माहौल में ही अदालतें और अधिवक्ता केवल अपने मतलब के काम करते नजर आते हैं। इस माहौल में बेशर्मी से न्यायिक कामकाज के लिए उपस्थित हुए एक अधिवक्ता से तदर्थ नियुक्त न्यायिक अधिकारी ने नौकरी छोड़कर वकालत करने और अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की।उस न्यायिक अधिकारी ने शातिर राजनीतिज्ञ की भांति अधिवक्ता का मन टटोला,- क्या आप मुझे वोट देंगे? अधिवक्ता युवा है यानि जेन जी श्रेणी का। उसने कहा,-पहले आपका मेनिफेस्टो पढूंगा। अधिवक्ता का जवाब सुनकर न्यायिक अधिकारी ने हारे हुए जुआरी की भांति चुनाव लड़ने का इरादा त्याग दिया। इस पूरे घटनाक्रम का लब्बोलुआब यह भी है कि न्यायिक अधिकारी आखिर बार अध्यक्ष ही क्यों बनना चाहते हैं? दरअसल बार अध्यक्ष बनने का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी शक्ति हासिल करना होता है जिससे न्यायिक अधिकारियों की शक्तियों का अपने हित में जितना चाहे उतना दोहन कर सके। एक अप्रमाणित अनुमान है कि मात्र एक वर्ष के लिए बार अध्यक्ष बनने वाले अधिवक्ता की चल अचल संपत्तियों में दस से पंद्रह करोड़ रुपए का अंतर आ जाता है।(नेक दृष्टि)
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