_-राजेश बैरागी-_
झांसी मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित सुदूर दक्षिण में उत्तर प्रदेश का सीमांत जिला और झांसी मंडल का मुख्यालय भी है।इसकी एक पहचान विश्वव्यापी है और वह है रानी लक्ष्मीबाई की वीर भूमि होने की। 17वीं शताब्दी के आरंभ में ओरछा के राजा ने जब यह शहर बसाया होगा तब यह एक मामूली से कस्बे जैसा रहा होगा। किले से देखने पर अब यह महानगर दृष्टि के ओझल होने से परे तक विस्तार पा गया है। पहले इसका नाम बलवंत नगर था। ओरछा से स्पष्ट दिखाई न देने पर इसका नाम झंसाई से झांसी पड़ा। 1857 के संग्राम में अपने राज्य के अस्तित्व के लिए अंग्रेजों से लड़ते हुए उस काल खंड में एक महिला ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तित्वों पर तथ्यात्मक उपन्यास लेखक वृंदावन लाल ने अपने ‘झांसी की रानी’ उपन्यास में यह बताने का प्रयास किया है कि लक्ष्मीबाई केवल अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए नहीं लड़ीं बल्कि उन्होंने सामाजिक उद्देश्यों के लिए भी युद्ध का वरण किया। दोपहर के समय जब हम झांसी के ऐतिहासिक किले में पहुंचे तो सूरज ठीक सिर के ऊपर था। इससे पहले और भी किले देखे परंतु इस किले को देखते हुए एक अलग अनुभव हुआ। यह एक पहाड़ी जैसे टीले पर बना है। एक पतली सड़क जिसके दोनों छोर झांसी शहर में खुलते हैं, पर इस किले का मुख्य द्वार है। किलों की संरचना ऐसी होती है जिसमें कोई जानकार ही सीधे घूम सकता है।हमारा गाड़ी चालक इस किले से भली प्रकार वाकिफ था। उसने हमें देखने लायक स्थल दिखाए और प्रतिबंधित जगहों पर जाने और समय व्यय करने से रोका।हम किले के उस सर्वोच्च शिखर तक गये, जहां से कभी रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की पकड़ में आने से बचने के लिए अपनी पीठ पर बंधे बच्चे के साथ घोड़े पर बैठकर खाई की ओर छलांग लगाई थी।उस वीरांगना को नमन कर हम दतिया के लिए रवाना हुए जहां मां पीतांबरा विराजमान हैं। सिद्ध पीठ के तौर पर प्रख्यात इस मंदिर में सभी दिनों खूब श्रद्धालु आते हैं। शाम लगभग तीन बजे का समय था जब हम मंदिर पहुंचे। लगभग 14 वर्ष पूर्व जब मैं यहां अपने चार साथियों सहित आया था, के मुकाबले अब इस मंदिर का काफी नक्शा बदल चुका है।इस समय कोई भीड़ नहीं थी। हमने बिना किसी हुज्जत के आराम से मां बगलामुखी के दर्शन किए। मंदिर के जिस द्वार से हमने प्रवेश किया, वहां नियुक्त सुरक्षाकर्मियों ने हमारा मार्गदर्शन किया। दतिया मध्यप्रदेश का जनपद है। झांसी से दतिया आते जाते हमने वहां हाइवे के किनारे कुछ औद्योगिक इकाइयां लगी देखीं जो इस क्षेत्र में रोजगार और निवेश का परिचय दे रही थीं। रास्ते में बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण का क्षेत्र भी दिखाई दिया जहां प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहीत अपनी भूमि की चारदीवारी की गई थी और आने वाले समय में उन भूमियों पर फैक्ट्री, मॉल तथा संस्थान विकसित होते दिखाई देंगे। क्रमशः।(नेक दृष्टि)
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