जंतर-मंतर छूमंतर

_-राजेश बैरागी-_

ठीक 302 बरस पहले दिल्ली में खगोलीय गणनाओं के लिए बनाया गया जंतर-मंतर कब धरती पर होने वाले राजनीतिक विरोधाभासों का केंद्र बन गया, किसी को मालूम ही नहीं हो पाया। जंतर-मंतर का मतलब विरोध प्रदर्शन स्थल हो गया।हाल ही में दो बड़े विरोध प्रदर्शनों का गवाह बना जंतर-मंतर अब संभवतः अपने पुराने समृद्ध इतिहास को नहीं दोहरा पाएगा। भारत सरकार ने इस स्थान को धरना प्रदर्शन स्थल के तौर पर खारिज कर दिया है। इसके बदले दिल्ली के रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली स्थित सीबीडी ग्राउंड को विरोध प्रदर्शन स्थल के तौर पर नामित किया गया है। क्या सरकार को कोसने वालों को ये तीनों स्थल आकर्षित कर पाएंगे? आमतौर पर घर के सामने मुंह से मुंह मिलाकर कोसने में जो आनंद है,वह दूसरे मुहल्ले में खड़े होकर कोसने में कहां। दिल्ली का जंतर-मंतर 302 बरस पहले 1724 में राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने बनवाया था। उन्होंने बाद में जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी ऐसे ही जंतर-मंतर बनवाए जिनमें से मथुरा वाला जंतर-मंतर अब नहीं है।शेष तीन स्थानों पर बने जंतर-मंतर अक्षुण्ण हैं परंतु दिल्ली के जंतर-मंतर की बात और है। यहां 33 बरस पहले दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक धरने प्रदर्शन से शुरू हुआ सिलसिला बीते कल तक जारी रहा। यह स्थान बहुत से ऐतिहासिक धरना प्रदर्शनों की याद दिलाता है।देश के सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठानों के अत्यंत निकट इस स्थल पर पहुंचने वाले लोग अपनी आवाज सरकार के कानों तक पहुंचाने के प्रति मुत्मइन रहते थे। कभी खाली रहने पर भी खबरनवीसों के लिए यह स्थल खबरों का केंद्र रहता रहा है। क्या खगोलीय गणनाओं और धरती पर घटने वाली घटनाओं में कोई अंतर्संबंध होता है? ज्योतिष के अनुसार ग्रह चाल से नीचे धरती पर होने वाली घटनाओं का सीधा संबंध होता है। क्या ग्रह नक्षत्रों की चाल से नजरें बचाकर धरती पर होने वाली घटनाओं को टाला जा सकता है? पुरुषार्थी अपने भाग्य को ग्रह नक्षत्रों का दास नहीं बनने देते हैं और ग्रह नक्षत्रों की चाल से नियंत्रित होने वाले लोग पुरुषार्थी नहीं होते हैं।(नेक दृष्टि)

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