नोएडा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों की बेपरवाही के शिकार अल्प निम्न और मध्यम आय वर्ग, जीडीए कर रहा है प्रयास 

राजेश बैरागी।क्या नोएडा ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्रों में अल्प, निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों को रहने के लिए एक अदद छत नसीब हो सकती है?इन शहरों को बसाने में जिन लोगों का सर्वाधिक योगदान है उन लोगों को सिर छिपाने के लिए इन प्राधिकरणों ने पिछले दस-पंद्रह वर्षों में क्या कोई योजना लागू की है? इस संबंध में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के वर्तमान उपाध्यक्ष अतुल वत्स एक बेहतरीन उदाहरण पेश करने की तैयारी में हैं। उन्होंने प्राधिकरण क्षेत्र के सभी बिल्डरों को उन्हें आवंटित ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्टों में ईडब्ल्यूएस,एलआईजी और एमआईजी की भूमि पर अब तक बनाए गए फ्लैटों की रिपोर्ट तलब कर ली है। इससे बिल्डरों में हड़कंप की स्थिति है। श्री अतुल वत्स ने एक मुलाकात में बताया था कि बिल्डर अपने मतलब अर्थात ऊंची कीमत पर बेचे जाने वाले फ्लैटों का निर्माण तो करते हैं परंतु अल्प निम्न व मध्यम आय वर्ग के फ्लैटों का निर्माण नहीं करते हैं। यहां तक कि इस प्रकार के फ्लैटों के लिए निर्धारित भूमि को विकसित तक भी नहीं करते हैं।दो दिन पहले जनपद गौतमबुद्धनगर के वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा ने फेसबुक पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नोएडा ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण के अधिकारियों से यह पूछने की मांग की कि क्षेत्र में 2017 से अब तक कितने अल्प आय वर्ग, निम्न आय वर्ग और मध्यम आय वर्ग के लिए मकान और फ्लैट बनाए गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने आग्रह किया कि बिल्डर योजनाओं में इन आय वर्गों के लिए क्या प्रावधान है तथा इन प्राधिकरणों के क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना लागू क्यों नहीं हो सकती है? जीडीए उपाध्यक्ष द्वारा किए जा रहे प्रयास और पत्रकार विनोद शर्मा के द्वारा मुख्यमंत्री से पूछे गए प्रश्नों में एक सामान्य तथ्य यह है कि औद्योगिक हो अथवा नगरीय विकास प्राधिकरण, इनके एजेंडे में वह व्यक्ति कहीं नहीं है जो इन नगरों का निर्माण करता है और उसके बाद इन नगरों की आवश्यक सेवाओं को चलाता है। अतुल वत्स से पहले कितने अधिकारी आए और गए, किसी ने भी इस आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया। नोएडा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों ने तो आंखें आसमान पर गड़ा ली हैं और जमीन पर देखना ही छोड़ दिया है। ये प्राधिकरण तो गुरुग्राम की तर्ज पर सौ से दो सौ करोड़ रुपए कीमत के फ्लैट न बना पाने की आत्मग्लानि से गुजर रहे हैं। यमुना प्राधिकरण के पूर्व मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ अरुणवीर सिंह यीडा क्षेत्र में तीस वर्गमीटर के आवासीय भूखंडों की एक विशाल योजना लाने की तैयारी कर रहे थे। उनकी सेवा समाप्ति के साथ वह योजना भी कहीं गुम हो गई है। क्या इन अत्याधुनिक नगरों में सुबह सवेरे से लेकर चौबीसों घंटे काम करने वाले फैक्ट्री श्रमिक, घरेलू नौकर, सफाई कर्मी प्रतिदिन अपने दूरदराज के घर गांव से आ सकते हैं?उन लोगों के नगर में रहने की क्या व्यवस्था की गई है। नगरों के बीच स्थित गांवों के स्लम में रहने को अभिशप्त ऐसे लाखों लोगों की परवाह किए बगैर नोएडा ग्रेटर नोएडा को एकीकृत औद्योगिक नगर कहा जा सकता है क्या?(

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *