राजेश बैरागी।एक पत्रकार साथी जो सम्मान में मुझे गुरुजी कहकर संबोधित करते हैं, ने फोन पर शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वह मुझे आज उपहार में ‘टीचर्स स्कॉच’ की एक बोतल भेंट करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। मैंने आज से पहले शराब के इस ब्रांड नेम पर इस प्रकार ध्यान दिया ही नहीं था और शिक्षक दिवस पर यह एक मौजूंं उपहार हो सकता है, यह तो मेरी कल्पना में भी नहीं आया था। मित्र स्वयं शराब का सेवन नहीं करते हैं। ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसे उपहार के बारे में विचार करना और भी आकर्षक लगा। इसके साथ ही मस्तिष्क इस विषय में विचार करने लगा कि उपहार कैसा होना चाहिए? इसके लिए उपहार देने की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए। उपहार या तो अपनी खुशी से दिया जाता है या विवश होकर। दीपावली जैसे अवसरों पर संस्थान स्वामियों द्वारा अपने कर्मचारियों को उपहार दिया जाना उनकी विवशता को ही दर्शाता है। क्या संस्थान स्वामी अपने कर्मचारियों को उपहार देकर उनपर कोई उपकार करते हैं? यह प्रश्न बाद को छोड़ते हैं। उपहार चाहे स्वयं प्रसन्न होकर दिया जाए या विवश होकर, उसमें सामने वाले (उपहार प्राप्त कर्ता)को प्रसन्न करने का भाव ही छिपा होता है। बच्चों को उपहार देकर उनके चेहरे पर आने वाली चमक देखकर अपना चेहरा भी दमकने लगता है। उपहार अनमोल होता है।उसे देने वाले की भावनाओं से ही मूल्यांकित किया जा सकता है। फिर भी हैसियत और जरूरत के हिसाब से मूल्यवान उपहार देने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। यह वस्तु,धन और आशीर्वाद के रूप में हो सकता है। हालांकि उपहार देते समय उपहार लेने वाले के लिए उसकी उपयोगिता पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए। तो क्या मित्र आज शिक्षक दिवस पर टीचर्स स्कॉच की बोतल मेरे लिए उसकी उपयोगिता के लिहाज से भेंट करने का विचार कर रहे हैं?हो सकता है जो उपहार उनकी दृष्टि में मेरे लिए उपयोगी हो, वह वास्तव में मेरे लिए उपयोगी न भी हो। परंतु उनकी भावनाओं का उपहार का मेरे लिए उपयोगी होने न होने से अधिक महत्व है। जहां तक संस्थान स्वामियों द्वारा अपने कर्मचारियों को उपहार देकर उनपर उपकार करने का प्रश्न है तो इसे दोनों पक्षों की एक-दूसरे पर निर्भरता से जोड़कर देखा जाना चाहिए। यदि एक-दूसरे पर निर्भरता के गर्भ से भी किसी उपहार का जन्म होता है तो इसमें बुराई क्या है?(









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