बात आंदोलन की

_-राजेश बैरागी-_

सरकार के विरुद्ध आंदोलन का स्वरूप क्या होना चाहिए? क्या एक आवाज पर एकत्रित किंतु अनियंत्रित भीड़ को सत्ता प्रतिष्ठानों पर चढ़ाई करने के लिए खुला छोड़ दिया जाना चाहिए? क्या विरोध के विषय पर पहले सरकार से वार्ता करने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए? किसी भी व्यवस्था को बदलने की मांग को मनवाने के लिए पहली शर्त वार्ता होनी चाहिए। एक भीड़ के दम पर किसी व्यवस्था को बदलने का उन्माद क्या लोकतंत्र के नाम पर उचित है? मैंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के संबंध में कुछ जानकारी एकत्र की है।1988 बैच के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार को उनकी इच्छा पर केरल राज्य में नियुक्ति नहीं मिली थी।तब भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुने जाने पर अपनी रुचि का राज्य चुनने का विकल्प नहीं होता था। रोस्टर के हिसाब से राज्य आवंटित होता था। उन्होंने वहां विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहते हुए एक अच्छे प्रशासक के तौर पर प्रसिद्धि प्राप्त की।2001 से एर्नाकुलम के जिलाधिकारी रहते हुए उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ जिलाधिकारी का पुरस्कार मिला।तत्समय केरल में कांग्रेस की सरकार थी। उन्होंने वहां गौश्री टापुओं को जोड़ने वाले और नोएडा की भांति अंधविश्वास के शिकार महत्वपूर्ण पुल का गौश्री आईलेंड विकास प्राधिकरण के सचिव के तौर पर निर्माण कराया। केंद्र में प्रतिनियुक्ति के दौरान कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी कराने जैसे दूरगामी निर्णय को मूर्त रूप देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते उन्होंने रक्षा क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी अग्रणी भूमिका निभाई। ऐसे व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करने के सरकार के निर्णय को ही कांग्रेस, कॉकरोच, कम्युनिस्टों और तमाम विपक्ष द्वारा इसलिए निशाना बनाया जा रहा है कि उन्होंने ऐसे निर्णय लिए जिनसे एस आई आर के बहाने से बहुत से मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर दिया गया।वोट चोरी और चोर वोटरों को चुनाव प्रक्रिया से हटाना,दो अलग विषय हैं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मतदाताओं की इच्छा के विरुद्ध चुनाव जीतना कोई नयी बात नहीं है। पश्चिम से लेकर पूरब तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक मतपत्र, मतपेटी लूटने, मतदाताओं को रिझाने, बरगलाने और धमकाने तक के अनगिनत किस्से भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। इतिहास से सबक लेकर वर्तमान और भविष्य को त्रुटिरहित बनाया जाना चाहिए। किसी भी सजग नागरिक का यह अधिकार है कि वह अपने प्रश्नों के उत्तर सरकार से मांगे। परंतु क्या यह प्रश्न आदेशात्मक होने चाहिएं कि यदि फलां तिथि तक ऐसा नहीं किया तो सबकुछ अस्त-व्यस्त कर दिया जाएगा? क्या कुछ बड़ी विदेशी शक्तियां कुछ भाड़े के अति उत्साही लोगों के माध्यम से देश को नेपाल और बांग्लादेश की तर्ज पर अस्थिर करने का प्रयास कर रही हैं?देश की जनता के अपनी सरकार का विरोध करने के संविधानिक अधिकार की तख्ता पलट करने के अराजक उद्देश्य से तुलना कैसे की जा सकती है। यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए, सरकार चाहे अच्छी हो या अच्छी न हो परंतु कुछ लोगों के निजी स्वार्थों के लिए वह कभी अच्छी नहीं होती है। ऐसे लोग अवसर मिलते ही किसी भी प्रकार और किसी भी हद तक जाकर सरकार को हटाने का प्रयास करते हैं। दुनिया के अनेक देश यह त्रासदी देख चुके हैं। भारत में ऐसा करने की जी तोड़ कोशिशें की जा रही हैं।(नेक दृष्टि)

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