_-राजेश बैरागी-_
जिलाधिकारी गौतमबुद्धनगर ने जिला प्रशासन से दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत 14 विषयों में कमिश्नरेट पुलिस को हस्तांतरित शक्तियों के संबंध में स्पष्टीकरण जारी किया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि इन विषयों से संबंधित कोई पत्रावली जिलाधिकारी,अपर जिलाधिकारी या उप जिलाधिकारी के समक्ष विचारार्थ अथवा कार्रवाई हेतु पेश नहीं की जाएगी। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में जारी किया गया है जब अप्रैल में हुए श्रमिक आंदोलन के लिए पुलिस द्वारा गिरफ्तार दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी पर रासुका के तहत कार्रवाई करने के लिए उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा कमिश्नरेट पुलिस के साथ साथ जिलाधिकारी को भी कड़ी टिप्पणियों के दायरे में लिया गया है।गौतमबुद्धनगर जनपद में कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था लागू होने के बाद से जिला प्रशासन और पुलिस के बीच अधिकारों की अस्पष्टता के चलते आम नागरिकों को हो रही समस्याओं के समाधान के लिए जिलाधिकारी मेधा रूपम ने एक सार्थक पहल की है।कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था में पुलिस को मिले कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अधिकारों के बारे में जहां आम नागरिक अनजान हैं वहीं पुलिस अधिकारियों पर अपनी कार्यपालक न्यायिक शक्तियों का उपयोग न करने की शिकायतें आम हैं। जिलाधिकारी की जनसुनवाई में रोजाना ऐसी शिकायतों की भरमार रहती है जो पुलिस से संबंधित होती हैं। आम नागरिक अपनी समस्याओं का समाधान के लिए पुलिस के स्थान पर जिला प्रशासन के अधिकारियों के पास जाते हैं। आकृति चौधरी मामले में उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा कमिश्नरेट पुलिस और जिलाधिकारी को लेकर की गई कड़ी टिप्पणियों से पहले ही निम्न स्तर पर चल रहे जिला प्रशासन और कमिश्नरेट पुलिस के रिश्तों को चोट पहुंची है। अपुष्ट जानकारी मिली है कि कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था में रासुका का प्रयोग करने के लिए जिलाधिकारी की भूमिका नहीं है। फिर आकृति चौधरी मामले में जिलाधिकारी की भूमिका क्यों जोड़ी गई। बहरहाल जिलाधिकारी गौतमबुद्धनगर मेधा रूपम ने राज्यपाल द्वारा कमिश्नरेट पुलिस को दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रदत्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियों और उसके द्वारा चौदह प्रकार के मामलों में सीधे कार्रवाई करने के अधिकारों को एक बार फिर स्पष्ट किया है। इनमें गुंडा एक्ट, रास्ते संबंधी आदि विवाद शामिल हैं।(नेक दृष्टि)
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