गौतमबुद्धनगर जिलाधिकारी के कार्यालय में जैसा मैंने देखा 

राजेश बैरागी।हालांकि विशेष अवसरों को छोड़कर गौतमबुद्धनगर जैसे जनपदों का सदर (जिलाधिकारी) विशेष योग्यता रखने वाले अधिकारियों को ही बनाया जाता है, आईएएस तो वो होते ही हैं। परंतु इस पद पर नियुक्त होने वाले कई अधिकारी सरकार की दृष्टि में चाहे जितने योग्य होते हों, नागरिकों के लिए वो पराये ही साबित होते हैं। जिलाधिकारी से जनता की अपेक्षाएं उसकी क्षमताओं से भी अधिक होती हैं।1997 में गठन होने से अब तक जनपद गौतमबुद्धनगर को 26 जिलाधिकारी मिल चुके हैं। वर्तमान जिलाधिकारी मेधा रूपम इस जनपद की पहली महिला जिलाधिकारी हैं। लगभग डेढ़ महीने पहले कार्यभार संभालने का साक्षी होने के चलते मुझे उनकी क्षमताओं और कार्यशैली को लेकर बहुत भरोसा नहीं हुआ। बाद के दिनों में मैंने कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों अधिकारियों से उनकी कार्यशैली को लेकर विचार विनिमय किया तो उनकी प्रतिक्रिया भी ठंडी ही थी। कुछ लोगों ने उन्हें बड़े घर की बेटी की संज्ञा दी।मैं निराश था क्योंकि पुलिस कमिश्नरेट बन जाने के बावजूद मैं इस दृढ़ मत का हूं कि जिले का सर्वोच्च अधिकारी जिलाधिकारी ही होता है।उसे मिलनसार, जनप्रिय और जनहितैषी होना चाहिए। यही सब जानने के लिए कल बुधवार को मैंने फरियादियों के बीच बैठकर जिलाधिकारी कक्ष में लगभग डेढ़ दो घंटे गुजारे। वहां खुला दरबार चल रहा था। अपने दुःख दर्द के समाधान की आस लेकर आए लोगों की भीड़ ने जिलाधिकारी की मेज को घेर रखा था।मेरा यह अनुमान गलत साबित हुआ कि पूर्व जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा जिले के सभी लोगों की समस्याओं का समाधान कर गए हैं क्योंकि कुछ फरियादी अपनी वर्षों पुरानी समस्या लेकर भी वहां डटे हुए थे।एक वृद्ध महिला अपने स्वर्गीय पति की संपत्ति के नामांतरण की समस्या को लेकर आयी थी।उसे लेखपाल सही स्थिति न बताकर चक्कर लगवा रहा था। एक महिला अपने पति और ससुराल वालों की प्रताड़ना से तंग आकर जिलाधिकारी की शरण में आयी थी। जिलाधिकारी ने संबंधित पुलिस उपायुक्त को फोन कर उस महिला को उनके पास भेजा। एक सज्जन किसी राजनीतिक हस्ती की सिफारिश लेकर असलाह लाइसेंस बनवाने के लिए आए थे। दो लोग अपनी संस्था के कार्यक्रम में जिलाधिकारी को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित करने आए थे, उन्होंने प्रशासनिक व्यस्तता के चलते उन्हें विनम्रता से मना कर दिया।बीच-बीच में कुछ लोग स्वागत करने की मंशा से गुलदस्ते लेकर भी आ जा रहे थे।इन सब गतिविधियों के बीच जो बात विशेष थी, वह थी जिलाधिकारी मेधा रूपम की धैर्य और शांति से प्रत्येक फरियादी की समस्या को ध्यान से सुनना और उसके अधिकतम समाधान का प्रयास करना। शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी की यही विशेष योग्यता है। उनकी अभी तक की उपलब्धियों में नोएडा में रहने का आकर्षण छोड़कर जिलाधिकारी के वास्तविक आवास को आबाद करना और युगों से एक ही स्थान पर जमे बैठे लोगों को उखाड़ फेंकना भी शामिल है।मेरे साथी पत्रकार डॉ देवेंद्र शर्मा ने बाहर निकलते समय मुझसे पूछा- क्या हमने आज अपना इतना समय बर्बाद नहीं किया? मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,-बिल्कुल नहीं, मुझे विश्वास हो गया है कि हमारा जिला सही हाथों में है

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