_-राजेश बैरागी-_
यह दूध का दूध और पानी का पानी होने का मामला कतई नहीं है।गत अप्रैल माह में नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन के दौरान हिंसा करने की एक आरोपी आकृति चौधरी पर एन एस ए के तहत कार्रवाई करने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा आकृति चौधरी पर रासुका लगाए जाने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए गौतमबुद्धनगर की जिलाधिकारी और संबंधित कमिश्नरेट पुलिस के अधिकारियों पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था। जिलाधिकारी मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी जिसपर आज बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी ‘रासुका की कार्रवाई में जिलाधिकारी के अलावा कई स्तरों पर निर्णय लिया जाता है इसलिए अकेले उन्हें ही इसके लिए जिम्मेदार क्यों माना जाना चाहिए’ करने के साथ निर्णय सुरक्षित रख लिया है। इस टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट के आने वाले निर्णय का आभास तो हो गया है। जिलाधिकारी को उच्च न्यायालय के आदेश से राहत मिलनी तो लगभग तय है। परंतु असल सवाल अभी भी जवाब की प्रतीक्षा में है कि कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था वाले जिलों में पुलिस की ऐसी कार्रवाइयों जिनमें जिलाधिकारी की अनुशंसा आवश्यक होती है, में जिलाधिकारी की भूमिका मामले को अग्रसारित करने वाले अधिकारी से अधिक क्या है। हालांकि जिलाधिकारी पद पर आसीन एक आईएएस व्यक्ति को किसी रिपोर्ट को बिना विचारे आगे बढ़ाने वाला रोबोटिक यंत्र नहीं होना चाहिए परन्तु पुलिस कमिश्नर पद पर जिलाधिकारी के मुकाबले कहीं वरिष्ठ आईजी स्तर का आईपीएस अधिकारी को नियुक्त करने से पहले सरकार को इस व्यवस्था की ऊंच-नीच को भली प्रकार समझना चाहिए था। यह समस्या बार-बार सामने आयेगी और आ रही है। उच्च न्यायालय ने केवल आदर्श स्थिति में अधिकारियों के अधिकारों को लेकर फैसला सुनाया है। संभवतः अदालत को भी कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था वाले जनपदों में अधिकारियों के अधिकारों की वास्तविक स्थिति का अनुमान नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस विशेष स्थिति को पहचानने के साथ अपने निर्णय में इस असंगति व्यवस्था पर भी कोई विशेष टिप्पणी करे।(नेक दृष्टि)
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