-राजेश बैरागी-
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक और एक्सप्रेस-वे का लोकार्पण किया। 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेस-वे से मेरठ से प्रयागराज पहुंचने में छः से सात घंटे कम लगने का अनुमान है। उत्तर प्रदेश में संचालित, प्रस्तावित और निर्माणाधीन एक्सप्रेस-वे की संख्या 20 से अधिक है। एक्सप्रेस-वे से यात्रा का एक अलग अनुभव होता है।तेज गति के साथ वहां चलने के अलावा कोई काम ही नहीं होता।क्या तस्करी के लिए भी हाईवे और एक्सप्रेस-वे बहुत लाभकारी हो गये हैं?चार दिन पहले गौतमबुद्धनगर जनपद के आबकारी विभाग और पुलिस के संयुक्त ऑपरेशन में अवैध रूप से बिहार ले जाई जा रही हरियाणा की 237 पेटी शराब से भरा ट्रक पकड़ा गया। बताया जा रहा है कि हाइवे और एक्सप्रेस-वे की संख्या बढ़ने से शराब और दूसरे सामानों की तस्करी भी बढ़ रही है।इन तीव्र गति और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचाने वाली सड़कों पर तस्करी की गतिविधियां भी तेजी से दौड़ रही हैं। हाईवे और एक्सप्रेस-वे अमूमन शहरों के बाहर से गुजरते हैं। इनपर जाम में फंसने और गति धीमी होने का झंझट भी नहीं होता। तस्करों के लिए यह मुफीद स्थिति होती है। हाइवेज पर हजारों वाहन तेज गति से दौड़ रहे होते हैं। ऐसे में सरकारी एजेंसियों द्वारा चैकिंग और रोकथाम भी नहीं होती है। गौतमबुद्धनगर के जिला आबकारी अधिकारी सुबोध कुमार का कहना है कि तस्करों के लिए हाइवे और एक्सप्रेस-वे के रास्ते एक राज्य से दूसरे और तीसरे राज्य में पहुंचना बेहद आसान हो गया है।हालांकि यह कहना ग़लत है कि हाइवे और एक्सप्रेस-वे के बन जाने के बाद ही तस्करी शुरू हुई है। प्रतिबंधित वस्तुओं तथा कर-चोरी के लिए हमेशा से तस्करी होती रही है। प्रवर्तन एजेंसियों पर भी यह आरोप लगते रहते हैं कि उनके संरक्षण में ही तस्करी होती है और समय समय पर अपनी परफॉर्मेंस तथा कर्तव्यनिष्ठा दिखाने के लिए ही तस्करी पर कार्रवाई की जाती है। परंतु यह भी सच है कि आम लोगों की सुविधा के लिए बन रहे हाईवे और एक्सप्रेस-वे की उपयोगिता तस्करों ने भी पहचान ली है
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