पहली इच्छा मृत्यु का फैसला

राजेश बैरागी।महाभारत के एक अहम् पात्र शिशुपाल के जन्म के साथ लगे आए अनावश्यक अंगों को देखकर सहसा उसकी मां ने परमात्म से पूछा,इसकी मृत्यु कैसे होगी? परमात्मा ने आकाशवाणी से उन्हें बताया कि जिस व्यक्ति की गोद में जाकर बालक शिशुपाल के अतिरिक्त हाथ व आंख झड़ जाएंगे,उसी के हाथों इसका वध होगा। श्रीकृष्ण की गोद में जाने पर ऐसा हुआ तो उसकी मां सच्चाई जानते हुए भी श्रीकृष्ण से शिशुपाल का वध न करने की विनती करने लगीं। गाजियाबाद निवासी हरीश राणा की आयु मात्र 33 बरस है। वह पिछले 13 वर्षों से सिर में गंभीर चोट लगने से अचेतन अवस्था (कोमा) में है। उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है। इतने लंबे समय से उसके ठीक होने की प्रतीक्षा कर रहे माता पिता की उसके लिए मांगी गई इच्छा मृत्यु की अपील सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर ली है। महाभारत के पात्र शिशुपाल के माता-पिता और हरीश राणा के माता-पिता में क्या कोई समानता है? दोनों के माता-पिता अपने पुत्रों की असामान्य स्थिति के समक्ष असहाय दिखाई देते हैं। मृत्यु शाश्वत सत्य है। यह पृथ्वी मृत्यु लोक कहलाती है। गुरु मां गाती हैं -साधो यह मुर्दों का गांव। फिर भी अपनी देह से उत्पन्न बच्चों के लिए मृत्यु की कामना कैसा फैसला है? बेशक यह विवशता का फैसला है। असामान्य बच्चे का जन्म लेना या जन्म लेने के बाद बच्चे का असामान्य हो जाना, दोनों ही स्थितियां माता-पिता के स्वयं के जीने को मुश्किल बना देती हैं। तो भी सांस है तो आस है।हरीश राणा के माता-पिता के लिए अपने पुत्र को इच्छा मृत्यु की अपील लेकर उच्चतम न्यायालय तक जाना विवशता में उठाया गया एक साहसिक कदम ही है। उनके इस कदम को साहसिक इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि इससे तेरह बरसों से अचेतन अवस्था में बिस्तर पर केवल पड़े रहने वाले व्यक्ति को उस पीड़ा से मुक्ति मिल जाएगी जिसे वह व्यक्त भी नहीं कर पा रहा है।

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