राजेश बैरागी।जब मैं यह पोस्ट लिख रहा था, मेरी सोसायटी में कानफाड़ू पटाखे चल रहे थे। एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ईसीआईयू) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों के अनुसार इस दीपावली पर भारत में 62000 टन बारूद से बने पटाखे चलाये गये। इतना बारूद रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में तीन दिनों में किए जाने वाले विस्फोटों के बराबर बताया गया है। क्या ये सब पटाखे ग्रीन थे? सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं द्वारा ग्रीन पटाखे चलाने पर सहमति देते समय यह भी बताया जाना चाहिए था कि देश में ग्रीन पटाखों का उत्पादन और उपलब्धता कितनी है। दरअसल कोर्ट हो या सरकारें,उनका बहाव हमेशा नीचे की ओर होता है। दीपावली पर पटाखे छोड़े जाने की परंपरा कब और क्यों पड़ी, इसका अनुमान मुझे नहीं है। परंतु फक्क से धूम धड़ाक करते हुए फटने वाले पटाखे बच्चों से लेकर बड़ों तक को आकर्षित तो करते हैं। संभवतः यह हमारी कुंठाओं के विस्फोट का प्रतिनिधित्व करते हैं। सत्तर के दशक में जब छुक छुक रेलगाड़ी चला करती थी,तब हम दीपावली पर रेल का पटाखा चलाते थे।दो सिरों पर बांधा जाने वाला लंबा धागा रेल पटाखे की पटरी का काम करता था।आग लगने पर रेल एक बार उस धागे पर दाहिनी ओर जाती और आग दूसरी ओर पहुंच जाने पर उसी धागे पर वापस लौटती और रेल का खेल खत्म हो जाता परंतु रेल चलाने की हसरत पूरी हो जाती थी।इसी प्रकार एक काले रंग की गोली में आग लगाने पर उसमें से एक काला नाग निकल आता था।विकार उत्पन्न होने पर कभी कभी दो नाग भी निकलते थे परन्तु ऐसी स्थिति में दोनों कुपोषण के शिकार दिखाई पड़ते थे। ये पटाखे बहुत प्रदूषण फैलाते थे परन्तु तब बाकी चीजें प्रदूषण नहीं फैलाती थीं। इसलिए तब सालभर में एक दिन चलने वाले पटाखे किसी के निशाने पर नहीं थे। अब सभी चीजों से प्रदूषण फैलता है। मोटर वाहन, औद्योगिक इकाइयां, भवन निर्माण से लेकर आपसी बातचीत और परस्पर व्यवहार तक प्रदूषण का उत्पादन करते हैं। क्या पटाखों पर रोक लगाने से प्रदूषण में कमी लाई जा सकती है? शायद किसी स्तर तक पटाखे प्रदूषण के कारक हैं परंतु उन्हें ग्रीन और रेड में बांटने का खेल ज्यादा प्रदूषण भरा है










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