
_-राजेश बैरागी-_
कर्तव्य का पालन करते हुए प्राण न्यौछावर करने वाले सेना और पुलिसकर्मियों को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। ऐसे बलिदानी लोगों की मृत्यु पर आंसू नहीं बहाए जाते बल्कि उन्हें ‘अमर रहें’ जैसे नारों से नवाजा जाता है।परंतु कर्तव्य पालन के दौरान अचानक होने वाले हादसे में जान गंवाने वाले जांबाज सिपाहियों को कैसे श्रद्धांजलि दी जाए और उनके बलिदान को किस प्रकार की श्रेणी में रखा जाए,यह प्रश्न मुझे कल से कचोट रहा है।कल 4 अगस्त को ग्रेटर नोएडा के सेक्टर ईकोटेक थ्री में एक इलेक्ट्रॉनिक चिप बनाने वाली कंपनी इलजिन में आधी रात को लगी भीषण आग बुझाने गये फायरकर्मियों में से पांच लोग उसी कंपनी की एक दो मंजिल से ऊंची दीवार के अचानक गिरने से उसके नीचे दब गए। एक ओर भीषण आग बुझाने की चुनौती के बीच हुई इस अनहोनी को संभालना बहुत कठिन था। किसी प्रकार दबे हुए साथियों को निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया परंतु दो सिपाहियों तीरथपाल तोमर और रोहित यादव की जान नहीं बचाई जा सकी। हादसा कहीं भी,कभी भी और कैसे भी हो सकता है। फायरब्रिगेड के इतिहास में न जाने कितने फायरकर्मियों ने दूसरों की जान बचाने के दौरान अपनी जान गंवाई है।आग और धुएं के बीच फंसे नागरिकों की जान बचाने के इस पेशे में खतरों से खेलने के अलावा कोई चारा नहीं है। दुर्घटना में दुर्घटना भी हो जाती है जैसे यहां हुई। सम्मुख संकट से मुकाबला करना संभव है परंतु ऊपर से अचानक आने वाले संकट से बचने का उपाय तो असंभव ही है। फिर भी इस अवसर पर कमिश्नरेट पुलिस ने जिस प्रकार इस हादसे के शिकार हुए अपने सहकर्मियों के प्रति पूरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी निभाई,वह वंदनीय है। हालांकि यह घटना एक सबक भी है जिसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए और सबक यह है कि कम से कम बड़ी और सार्वजनिक उपयोग की इमारतों को फायर एन ओ सी देते समय स्वार्थवश सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।(नेक दृष्टि)
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