
-राजेश बैरागी-
स्थानीय स्तर पर श्रमिकों के आक्रोश को समझने में विफलता के चलते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर यहां पहुंची उच्चाधिकार प्राप्त समिति के अधिकारियों ने पूरी तरह शांति स्थापित करने के लिए जिला नहीं छोड़ा है। उधर जिलाधिकारी मेधा रूपम स्वयं तथा अपर जिलाधिकारी वित्त अतुल कुमार, एडीएम प्रशासन मंगलेश दुबे तथा प्रशासन के अन्य अधिकारियों ने आज भी आंदोलन प्रभावित औद्योगिक क्षेत्रों में पैदल घूमकर न केवल हालात का जायजा लिया बल्कि श्रमिकों से संवाद कर उनके हित में लागू किए गए फैसलों से अवगत भी कराया। पुलिस ने शक्ति नियंत्रित शांति बनाए रखने के लिए पैदल गश्त और मार्च निकाले। उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने अध्यक्ष उद्योग एवं अवस्थापना आयुक्त दीपक कुमार के नेतृत्व में जिला मुख्यालय (कलेक्ट्रेट) में जहां श्रमिक आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों व एजेंसी संचालकों से वार्ता की वहीं अधिकारियों के साथ बैठक कर हालात पर चर्चा की।आज दिनभर में तीन चार स्थानों श्रमिकों द्वारा मामूली प्रदर्शन के अलावा आमतौर पर शांति बनी रही और सभी औद्योगिक इकाइयों में पहले की तरह कामकाज हुआ।इन सब से इतर यह प्रश्न सभी फैक्ट्री मालिकों, निवासियों तथा शांति प्रिय श्रमिकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था वाले इस औद्योगिक जनपद में आखिरकार श्रमिकों का इतना बड़ा और हिंसक आंदोलन कैसे हो गया?13 वर्ष पहले फरवरी 2013 में हुए श्रमिकों के ऐसे ही हिंसक आंदोलन के समय जिले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की कप्तानी वाली पुलिस व्यवस्था थी।उस घटना के बाद शासन ने यहां एक औद्योगिक पुलिस उपाधीक्षक का पद केवल उद्यमी श्रमिक विवादों को सुलझाने के लिए सृजित किया था।2020 आते-आते शासन ने यहां की बेहतर कानून व्यवस्था और त्वरित पुलिसिंग के लिए पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू कर दी। अब यहां कम से कम पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में आधा दर्जन से अधिक आईपीएस सहित तीन दर्जन से अधिक राजपत्रित पुलिस अधिकारी नियुक्त हैं। लगभग आठ हजार पुलिसकर्मी कमिश्नरेट पुलिस की ताकत हैं। जगह-जगह पुलिस चौकी खोली गई हैं तो एक भारी भरकम एलआईयू विभाग भी है।इन सबके बावजूद श्रमिक इस कदर आक्रोशित हैं और आंदोलन इतना हिंसक हो जाएगा, इस सूचना का कहीं अता-पता नहीं था। यह सही है कि यह आंदोलन किसी श्रमिक संगठन के नेतृत्व में नहीं हुआ। पुलिस के दावे को मानें तो ऐसे डेढ़ दर्जन व्हाट्स एप ग्रुपों का पता चला है जिनपर संदेश प्रसारित कर आंदोलन भड़काया गया। ये व्हाट्स ऐप ग्रुप ताजा ताजा बनाए गए थे। ऐसे भी इनपुट मिले हैं जिनसे इस आंदोलन को भड़काने में बाहरी लोगों के शामिल होने का अंदेशा है। परंतु यह सब नोएडा जैसे शो विंडो औद्योगिक शहर में चार दिनों तक चले हिंसक आंदोलन के बाद की बातें हैं। प्रश्न यह है कि यह सब होने से रोकने के लिए जो होना चाहिए था,वह क्यों नहीं हुआ? क्या कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था भी परंपरागत पुलिस व्यवस्था जैसी ही है?इन प्रश्नों पर लखनऊ को भी विचार अवश्य करना चाहिए।(नेक दृष्टि)
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