राजेश बैरागी।यह मनोवैज्ञानिक प्रश्न हो सकता है कि दो, तीन, पांच या दस वर्ष की मासूम बच्ची से दुष्कर्म करने वाले नरपिशाचों को कैसा अनुभव होता होगा। सामान्य प्रश्न यह है कि यदि ऐसी पीड़ित बच्ची पुनर्विवाह के परिणामस्वरूप मां के दूसरे पति के संरक्षण में है और वह संरक्षण दाता उस बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाता है तो इस सामाजिक व्यवस्था को कैसे संरक्षण दिया जा सकता है। गौतमबुद्धनगर के सूरजपुर कस्बे में रहने वाले एक नरपिशाच ने अपनी पुर्नब्याहता की पहली बेटी के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी।वह बच्ची छः वर्ष की थी। उसने भेद खुलने के भय से उसका गुपचुप अंतिम संस्कार करना चाहा परन्तु पड़ोसियों की सतर्कता से सफल नहीं हो पाया। मैं कानून में साक्ष्य मिटाने की धाराओं का हमेशा विरोधी रहा हूं। एक अपराधी से अपराध करने के बाद सज्जनता से साक्ष्यों के साथ कानून के समक्ष समर्पण करने की अपेक्षा बिल्कुल बेमानी है। बहरहाल उस नरपिशाच को पुलिस ने पकड़ लिया।अब न्यायालय उसके अपराध के लिए उसे दंडित करेगा। ऐसे जानवर (इंसान नहीं) के लिए क्या सजा तज्वीज की जानी चाहिए? क्या उसे इस धरा पर जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं देना चाहिए? यह प्रश्न न्यायालय के विचारार्थ छोड़ देते हैं। सभ्य समाज के लिए विचारणीय प्रश्न यह है कि उस मासूम बच्ची को इस दुर्घटना का क्या अनुभव हुआ होगा? छः वर्ष की बच्ची जीवित रहने के लिए खाने का आनंद लेना नहीं जानती, यौन क्रिया का आनंद कैसे ले सकती है। स्त्री पुरुष के बीच यौन संबंध दोनों के आनंद पर आधारित शारीरिक क्रिया है। यह एकतरफा हो ही नहीं सकता। नरपिशाच प्रकृति के इस सर्वोच्च सिद्धांत से परिचित नहीं होते हैं। प्रकृति की इस व्यवस्था से अपरिचित जानवरों को इस धरती पर जीवित रखने की क्या आवश्यकता है?
यह धरती नरपिशाचों के लिए तो नहीं है











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