_-राजेश बैरागी-_
बीते कल एक कार को तिलपता गोलचक्कर (ग्रेटर नोएडा)पर रोककर पुलिसकर्मी ने चालक से पूछा,- तुम्हारी गाड़ी कॉमर्शियल नहीं है और तुमने इसमें सामान भर रखा है?चालक ने बताया कि ये उपहार हैं जो उसे कहीं से प्राप्त हुए हैं। पुलिसकर्मी इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। उसने पूछा,-इतने उपहार किसने दिए हैं?चालक ने बताया कि यदि वह (पुलिसकर्मी)भी उसे उपहार देगा तो वह (चालक)ले लेगा। दरअसल होली दीपावली जैसे त्योहारों पर चौराहों पर पुलिस की जांच बढ़ जाती है। यह जांच आपत्तिजनक वस्तुओं के परिवहन पर रोक लगाने के उद्देश्य से बताई जाती है। हालांकि पुलिस के लिए इस जांच के कुछ और मायने रहते हैं। अवैध कमाई के लिए पुलिस जांच के नाम पर ऐसे सवाल पूछती है जिसके लिए उसे लगाया नहीं जाता है। इस कार चालक से निजी गाड़ी में सामान ढोने का सवाल भी ऐसा ही था। निजी गाड़ी में सामान ढोने की जांच परिवहन विभाग या राज्य कर विभाग का क्षेत्र है। परंतु पुलिस तो पुलिस होती है। सीआरपीसी में उसे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति, वस्तु और घटना की जांच का व्यापक अधिकार प्राप्त है।चालक एक विशेष पेशे से संबंधित था, इसलिए पुलिस की सामान्य पूछताछ से उसपर कोई असर नहीं होना था। और पुलिस डरने वाले को डराने की रणनीति पर ही काम करती है। लिहाजा जो नहीं डरता, उसे न छेड़ने में ही भलाई होती है। यह वाकया जब मेरे संज्ञान में आया तो मेरे मस्तिष्क में पहला सवाल यही आया कि पुलिसिंग इतनी कमजोर क्यों है?उसे किसी खास पेशेवर या रसूख वाले व्यक्ति की जांच करने में कमजोरी क्यों अनुभव होती है?जब कोई भी जिम्मेदार अपने मूल कर्तव्य को त्यागकर निजी स्वार्थ से भर जाता है तो उसकी स्थिति स्वत: कमजोर हो जाती है।चालक पूरी ठसक के साथ अभी भी वहीं खड़ा था परंतु पुलिसकर्मी का साहस उसकी गाड़ी में रखे सामान की जांच करने की नहीं हो रही थी। पुलिसकर्मी जब दूसरे वाहनों की जांच करने का स्वांग करने लगा तो वह वाहन चालक बगैर उससे इजाजत लिए अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गया। हालांकि उस चालक की गाड़ी में उसे मिले उपहार ही थे परंतु पुलिसकर्मी को तो यह स्पष्ट नहीं था। फिर उसने उसे अनदेखा क्यों किया? यही वह प्रश्न है जो समूची पुलिस व्यवस्था से उत्तर की अपेक्षा करता है।(नेक दृष्टि)
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