यात्रा वृत्तांत(6) *आगरा के मंडलायुक्त और जिलाधिकारी से मुलाकात

_-राजेश बैरागी-_

बड़े भाई समान आगरा के मंडलायुक्त नागेंद्र प्रताप सिंह अपने कार्यालय में मिले।वे आगरा के 61वें मंडलायुक्त हैं। मंडल बनने के बाद शुरुआत में इस पद पर कई आईसीएस अधिकारी भी नियुक्त रहे हैं। मंडलायुक्त कार्यालय परिसर काफी बड़ा और पुराने तरीके से बना हुआ है। हालांकि अधिकारियों के कुछ नये कक्ष बने हैं जो क्षेत्रफल के लिहाज से जनसुनवाई जैसे कार्यों के अनुकूल भी हैं। मंडलायुक्त नागेंद्र प्रताप सिंह ने अपना अधिकांश सेवाकाल आगरा मंडल में ही बिताया है। मथुरा,वृन्दावन में उनका हृदय बसता है। मथुरा वृन्दावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और ब्रज तीर्थ क्षेत्र विकास परिषद के मुख्य कार्यपालक अधिकारी रहने के दौरान उन्होंने मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन आदि क्षेत्रों में न केवल कई उल्लेखनीय विकास कार्य कराए बल्कि गोवर्धन जैसे तीर्थ क्षेत्र का कायाकल्प करने के साथ क्षेत्र के रखरखाव के लिए समाज के सक्षम लोगों को सामूहिक जिम्मेदारी भी सौंप दी। आजकल वे यमुना में वृंदावन से मथुरा तक स्टीमर जैसी मोटरबोट चलाने की योजना बना रहे हैं जिससे लोगों को इस क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ जोड़ा जा सके। सेवानिवृत्त होने के अति निकट होने के बावजूद उनकी कार्य करने की क्षमता और जुनून में कोई अंतर नहीं आया है। यहीं अपर आयुक्त पद पर गौतमबुद्धनगर की दादरी तहसील के उपजिलाधिकारी रहे राजेश यादव भी नियुक्त हैं। उनके साथ हम लोगों ने उनके दादरी के कार्यकाल की यादें ताजा कीं। लगभग छः किलोमीटर दूर जिलाधिकारी कार्यालय यानी जिला मुख्यालय है। यहां जिलाधिकारी पद पर आईएएस मनीष बंसल तैनात हैं जो हमारी जिलाधिकारी मेधा रूपम के पति भी हैं। उनसे भी शिष्टाचार भेंट की और जिले की प्रशासनिक तथा राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चा की। यहां कलेक्ट्रेट परिसर पुराने तरीके का बहुत ही अजीब सा लगा।इसे आगरा की ऐतिहासिक छवि के अनुसार तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता है।इसी परिसर में आगरा कमिश्नरेट पुलिस के उपायुक्त का भी कार्यालय है जिसने कलेक्ट्रेट के स्वरूप को और भी बिगाड़ दिया है। पुलिस विभाग की गाड़ियों के खड़े रहने और आवाजाही के चलते कलेक्ट्रेट परिसर में घुसना और घूमना मुश्किल हो गया है। आगरा में पंछी के मुकाबले गोपाल का पेठा तेजी से आगे बढ़ रहा है। रामबाबू के परांठे की जितनी तारीफ सुनी थी,वैसा नहीं पाया। दरअसल जिसे वो परांठा कहते हैं,असल में वह कचौड़ा होता है। परांठा तवे पर बनाया जाता है जबकि यह कड़ाही में तेल में डीप फ्राई करके पेश किया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ढाई सौ रुपए का एक परांठा क्यों होना चाहिए। आगरा अंतरराज्यीय बस अड्डे से नोएडा के लिए सीधे वातानुकूलित इलेक्ट्रिक बसें चलाई जा रही हैं। यह एक आरामदायक सवारी साबित हुई। समाप्त (नेक दृष्टि)

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