_-राजेश बैरागी-_
क्या भाजपा शासित मध्यप्रदेश के नगर निकाय आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं? क्या वहां फिनायल जैसी चीज 33500/- रुपए प्रति लीटर खरीदी जा रही है? वहां के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने नगर निकायों के अधिकारियों को एक बैठक में आईना दिखाते हुए कहा कि अधिकारी यह समझते हैं कि उनके कृत्यों का किसी को कुछ नहीं पता परंतु हमें पता है कि पांच रुपए लीटर वाला फिनायल 33500/- रुपए प्रति लीटर खरीदा जा रहा है और दो लाख रुपए कीमत की कचरा गाड़ी छ: लाख रुपए में खरीदी गई हैं। एक अनुमान के अनुसार मध्यप्रदेश में पिछले एक वर्ष में नगर निकायों में इस प्रकार के सामानों की खरीदारी और अन्य कार्यों में ढाई सौ करोड़ रुपए का गोलमाल हुआ है। और उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकायों में क्या हो रहा है? सिविल निर्माण से लेकर साफ-सफाई, कचरा उठाने जैसे कार्यों में हर दिन फर्जी बिल फाड़े जा रहे हैं। किसी भी प्राधिकरण, नगर निगम, नगर पालिका विभाग में दर्जनों ऐसी फाइलें चलती मिल जाएंगी जिनमें वर्णित कामों का कहीं अता-पता नहीं है। हेल्थ,जल,मल और अर्बन सर्विस ऐसे विभाग हैं जिनमें होने वाले खर्चों को गिनना तारे गिनने जैसा कठिन है। एक प्राधिकरण का एक अधिकारी किसी विशेष प्रयोजन से एक स्थान से दूसरे स्थान पर कूड़ा पहुंचाने की कथा सुना रहा था। उसने जो मात्रा बताई, उसकी ढुलाई में कम से कम दो सौ ट्रक लगने चाहिए थे। ट्रकों की संख्या पूछने पर अधिकारी की जबान तालू से चिपक गई। जबसे औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में मंत्री का दखल बढ़ा है और लेन-देन के किस्से भीतरी कमरों से निकलकर चौपालों पर सुनाए जाने लगे हैं,तब से यहां नियुक्त अधिकारी और कर्मचारी अधिक से अधिक लूट लेने में जुटे हुए दिखाई देते हैं। हालांकि एक शीर्ष अधिकारी का कहना है कि यहां मची लूट का सीधा संबंध लखनऊ से है। मध्यप्रदेश में अपर मुख्य सचिव ने अपने ही नगर निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार को किस भावना से प्रेरित होकर उजागर किया है, यह तो वही जानते होंगे परंतु उत्तर प्रदेश में ऐसा होता भी दिखाई देने की कोई आशा नहीं है। हालांकि भ्रष्टाचार के प्रति सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अभी तक चालू बताई जा रही है।(नेक दृष्टि)
Leave a Reply