निजी औद्योगिक पार्क विकसित करने की नीति पर सवाल: *सीकेएस इंडस्ट्रियल पार्क में ले आउट प्लान स्वीकृत होने से पहले ही खसरा नंबर में भूखंडों की बिक्री

_-राजेश बैरागी-_

उत्तर प्रदेश की वर्तमान योगी सरकार द्वारा राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए किए जा रहे उपायों के तहत औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए निजी औद्योगिक पार्कों को विकसित करने की छूट का दुरुपयोग सामने आने लगा है। हापुड़ मोदीनगर के बीच किल्हौड़ा गांव की भूमि पर एक निजी बिल्डर द्वारा विकसित किए जा रहे औद्योगिक पार्क में ले आउट प्लान स्वीकृत होने से पहले ही भूखंड बिक्री शुरू कर दी गई है। दिलचस्प तथ्य यह है कि बिक्री किए जा रहे भूखंडों का बैनामा खसरा नंबर के आधार पर किया जा रहा है जो आगे चलकर संपत्ति विवादों को जन्म दे सकता है।उत्तर प्रदेश सरकार की औद्योगिक एवं बिजनेस पार्क नीति 2025-26 के तहत निजी विकासकर्ताओं को औद्योगिक एवं बिजनेस पार्क विकसित करने की छूट दी गई है। हालांकि राज्य में एक दर्जन से अधिक औद्योगिक विकास प्राधिकरणों के रहते निजी विकासकर्ताओं को औद्योगिक पार्क विकसित करने की छूट देने की नीति लागू करना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश समेत देशभर में बिल्डरों द्वारा विकसित किए गए आवासीय तथा व्यवसायिक प्रोजेक्ट्स की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है जिनमें बिल्डरों द्वारा किए गए वादे कभी पूरे नहीं किए जाते हैं और लाखों खरीदारों सहित विकास प्राधिकरणों के धन तथा सपनों का गबन किया गया है। ऐसे में बिल्डरों को औद्योगिक पार्क विकसित करने की छूट देने के गंभीर परिणाम भविष्य में देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल गाजियाबाद में मोदीनगर हापुड़ रोड पर सीकेएस बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किसानों से सीधे भूमि खरीदकर विकसित किए जा रहे सीकेएस इंडस्ट्रियल पार्क की बात करते हैं। यूपीसीडा द्वारा पार्क विकसित करने का लाइसेंस दिया गया है परंतु प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क का ले आउट प्लान अभी तक स्वीकृत नहीं किया गया है।ले आउट प्लान स्वीकृत होने की प्रतीक्षा किए बगैर बिल्डर द्वारा औद्योगिक भूखंडों की बिक्री की जा रही है। इंडिया एक्सपो मार्ट में आयोजित यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में बाकायदा लंबी चौड़ी स्टॉल लगाकर प्रचार करने आए इस बिल्डर ने लोगों को आकर्षित करने के लिए यूपीसीडा का लोगो लगाया हुआ था। अपने पार्क के ब्रोशर पर भी यूपीसीडा द्वारा एपरुव्ड दर्शाया गया है।बिल्डर प्रतिनिधि बताते हैं कि ले आउट प्लान स्वीकृत नहीं है। यह भी बताया गया है कि आधे से अधिक भूखंड बेचे जा चुके हैं। हालांकि प्रस्तावित पार्क के बीच में कुछ भूमि अभी तक किसानों से नहीं मिली है।यह भी बताया गया कि भूखंडों की रजिस्ट्री खसरा नंबर में की जा रही है। इस संबंध में जानकारी करने पर एक अधिकारी ने बताया कि खसरा नंबर में की गई रजिस्ट्री भविष्य में संपत्ति विवाद का कारण बन सकती है।उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार की औद्योगिक एवं बिजनेस पार्क नीति के तहत राज्य भर में एक दर्जन से अधिक स्थानों पर ऐसे निजी औद्योगिक पार्क विकसित किए जा रहे हैं। नीति अनुसार पूर्वांचल तथा बुंदेलखंड में 20 एकड़ तथा मध्य व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 30 एकड़ भूमि पर निजी औद्योगिक पार्क विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए संबंधित औद्योगिक विकास प्राधिकरणों से लाइसेंस तथा ले आउट प्लान स्वीकृत कराना आवश्यक है। इसके साथ ही बिल्डर द्वारा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल, सीवरेज आदि के निस्तारण की वहीं व्यवस्था की जाएगी। दिलचस्प तथ्य यह है कि राज्य के भारी-भरकम औद्योगिक विकास प्राधिकरणों द्वारा स्थापना के चालीस पचास वर्षों बाद आज तक भी अपने क्षेत्रों से निकलने वाले कूड़ा कचरा तथा अपशिष्ट जल सीवरेज आदि के निस्तारण की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। व्यवस्था न कर पाने के लिए सभी औद्योगिक विकास प्राधिकरण राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण और सुप्रीम कोर्ट तक के निशाने पर हैं।(नेक दृष्टि)

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