_-राजेश बैरागी-_
17 सितंबर 1950 को जन्मे नरेंद्र मोदी के जीवन में बीते 25 वर्ष का क्या महत्व है? किसी भी राजनीतिक दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता को उनकी उपलब्धियों से ईर्ष्या हो सकती है। नरेंद्र मोदी ने एक राज्य गुजरात का शीर्ष मुख्यमंत्री पद जिस समय संभाला, उन्होंने आधी आयु पार कर ली थी। आमतौर पर बड़ी सफलताएं पचास वर्ष पूरी होने से पहले हासिल कर ली जाती हैं या उनकी भूमिका तैयार हो चुकी होती है। नरेंद्र मोदी ने एक विषम राजनीतिक परिस्थिति में अपवादस्वरूप मुख्यमंत्री पद प्राप्त किया और फिर उन्होंने अब तक मुड़ कर पीछे नहीं देखा।वे भाजपा के ही नहीं बल्कि देश के सबसे सफल नेताओं में शुमार हो चुके हैं। उनकी दिन के अधिकतम समय में अनवरत कार्य करने की आदत के समक्ष सभी नतमस्तक हैं। राजनीति झूठ और हवाबाजी का कारोबार रह गया है और मोदी भी इससे परे नहीं हैं। गुजरात सामान्यतः एक शांत रहने वाला राज्य है, इसलिए वहां की कानून व्यवस्था को लेकर मोदी को विशेष अंक न भी दिए जाएं तो भी अपने कार्यकाल में उन्होंने वहां उद्योग धंधे तथा आम जनजीवन के लिए अच्छा माहौल बनाए रखा। मैं 2012 और 2015 में चार चार दिनों के लिए गुजरात में था। वहां के मुसलमान उनके समर्थक नहीं थे परंतु सरल जीवनयापन के लिए वे मोदी की प्रशंसा करते थे।देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने यातायात और आवागमन के साधनों क्रमशः रेलवे, हाइवे और एयरवेज का खूब विस्तार किया।देश का औद्योगीकरण करने और रक्षा क्षेत्र को सुसज्जित करना उनकी प्राथमिकता में है। इसके लिए देश के नागरिकों को भरपूर भुगतान करना पड़ रहा है। चुनाव जीतने के लिए सभी आवश्यक अनावश्यक, उचित और कथित तौर पर अनुचित भी, हथकंडे अपनाने से उन्हें भी गुरेज नहीं है। सत्ता हाथ में होगी तो ही अपने एजेंडे को लागू किया जा सकता है। उनके दामन पर गोधरा काण्ड और देश को हिंदू मुस्लिम भेदभाव में बांट देने के आरोप भी हैं। उन्होंने एक ऐसा माहौल निर्मित करने में सफलता प्राप्त की है जिसमें उनके बाद कौन के प्रश्न पर सभी मौन हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के तौर पर एक भी संवाददाता सम्मेलन का सामना नहीं किया है जबकि देश और विदेशों में सबसे अधिक आम सभाओं को संबोधित करने का रिकॉर्ड उनके नाम हो चुका है। उनके नाम अनेक उपलब्धियां हैं। उनके कार्यकाल की एक खामी यदि मुझे बतानी हो तो वह है ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण। केंद्र से लेकर भाजपा शासित सभी राज्यों में अधिकारियों का ही बोलबाला है। मुख्यमंत्री या तो केंद्र के अधीन हैं या अधिकारियों के। ये अधिकारी अपने कर्तव्यों को दरकिनार कर राजनीतिक नफे नुक्सान की बात करते दिखाई देते हैं।(नेक दृष्टि)
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