_-राजेश बैरागी-_
यह आवश्यक नहीं है कि आत्महत्या के लिए 32वीं या 42वीं मंजिल ही चुनी जाए। मौत तो ठोकर लगने से भी हो सकती है और आत्महत्या के लिए तमाम अन्य साधनों की भी कमी नहीं है। नोएडा की सुपरनोवा जैसी गगनचुंबी इमारतें क्या संदेश देती हैं? क्या यही कि मनुष्य की आकाश को छूने की महत्वाकांक्षा बदस्तूर जारी है और तीन सौ मीटर ऊंची इमारत बनाना केवल एक पड़ाव भर है। इससे डेढ़ गुना ऊंची जुड़वां इमारतें 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क में एक हवाई जहाज के हमले से गिराई जा चुकी हैं। बुजुर्ग खलीफा की ऊंचाई और अधिक है। इमारतों की ऊंचाई मनुष्य के सपनों से अधिक कभी नहीं हो सकती है। मानेसर निवासी संभव जैन मात्र 32 वर्ष का था। उसने आत्महत्या के लिए सुपरनोवा की 42 वीं मंजिल चुनी। उसकी 42 महीने पहले शादी हुई थी और एक बच्चा भी है। पत्नी बच्चे के साथ अलग रहती है। नौकरी पेशा वाले परिवार के सदस्य संभव जैन पर पत्नी के उपचार में अत्यधिक खर्च होने के कारण कर्ज भी बताया जा रहा है।जमीन पर खड़े होकर 42वीं मंजिल देखने के फेर में पीछे की ओर गिर जाने का संयोग हो सकता है।संभव ने उसी मंजिल से छलांग लगाकर जान दी। क्या महानगरों का यह गगनचुंबी इमारतों वाला स्वरूप भयानक हो गया है जहां जीने से अधिक मरना आसान हो जाता है।दो महानगरवासी आपस में इस बात पर उलझ सकते हैं कि उसके महानगर में सुपरनोवा जैसी इमारत है या नहीं परंतु शायद इस बात पर शर्मशार हो जाएं कि उनकी सुपरनोवा किसी युवा की आत्महत्या के काम आई।(नेक दृष्टि)
Leave a Reply