_-राजेश बैरागी-_
1975 में प्रदर्शित कालजई हिंदी फीचर फिल्म शोले को तत्कालीन दर्शक समूह ने एक से अधिक बार देखा था। कहानी ही इतनी कसी हुई और अभूतपूर्व थी कि लोग उसे एक बार देखकर संतुष्ट नहीं हो पाते थे। शोले के अलावा बॉबी,मुगल ए आजम, बाहुबली और धुरंधर भी ऐसी ही हिंदी फीचर फिल्म रही हैं जिन्हें अनेक बार देखा गया। फिर एक दिन इन सभी फिल्मों को सिनेमाघरों के पर्दों और टेलीविजन तथा दूसरे माध्यमों से भी हटना पड़ा। क्यों? क्योंकि इनमें कोई नवीनता नहीं बची थी।मैं पिछले एक वर्ष से कुछ शीर्ष नेताओं के भाषणों को बेहद अरुचि के साथ सुन रहा हूं। उनमें कोई नवीनता नहीं है। कुछ राजनीतिक दलों को महज कोसने और अपनी अपरिवर्तित उपलब्धियों को गिनाते गिनाते संभवतः इन नेताओं को भी अपने भाषणों से अरुचि होने लगी होगी। यहां एक प्रश्न यह खड़ा होता है कि नेताओं को भाषणों पर कितना आश्रित होना चाहिए? मैंने देखा है कि सचिन तेंदुलकर की जब भी आलोचना होती थी तो वो अपने बल्ले से जवाब देते थे। यह असंभव है कि नेता न बोले। यदि वह सत्तारूढ़ है तो सरकार की नीतियों, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं से नागरिकों को अवगत कराने की जिम्मेदारी उसी की है। विपक्ष का नेता होने पर नागरिकों की आवश्यकताओं और सरकार की नाकामियों को उजागर करने की जिम्मेदारी है। परंतु यदि नेता टेपरिकॉर्डर बन जाए तो क्या हो? क्या जनता हर बार उसे सुनने के लिए एकत्रित होना पसंद करेगी? मैं देखता हूं कि पार्टी संगठन और विधायक सांसदों द्वारा जुटाई जाने वाली भीड़ के अतिरिक्त अपने ऐसे नेता को सुनने कोई नहीं आता। कुछ लोग उन्हें साक्षात देखने की इच्छा से आ जाते हैं परन्तु उन्हें उनके भाषण में कोई रुचि नहीं होती। मुझे लगता है कि नेताओं और खासतौर पर सत्तारूढ़ नेताओं को एक ही स्थान पर बार-बार आकर भाषण देने से बचना चाहिए। इसके बरअक्स उन्हें जिलेवार या मंडल मुख्यालयों पर जनता दरबार लगाकर जनता की समस्याएं सुनना चाहिए। इससे उन्हें जमीनी हकीकत का पता तो चलेगा ही, जनता से सीधा जुड़ाव भी बनेगा। एक प्रायोजित भीड़ को बार-बार एक ही प्रकार का भाषण देने से जो ऊब पैदा होती है,वह किसी भी प्रकार उत्पादक नहीं होती है। इससे नेता के भाषण के साथ साथ नेता से भी लोग ऊबने लगते हैं। और यह किसी भी नेता के लिए शुभ संकेत नहीं है।(नेक दृष्टि)
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