_-राजेश बैरागी-_
क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संस्कारों का हस्तांतरण हो सकता है? यह प्रश्न आज के एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित उस समाचार से उत्पन्न हुआ है जिसमें बताया गया है कि कस्तूरबा विद्यालय के छात्र अब एआई से संगीत सीखेंगे।एआई के संबंध में आमतौर पर जितनी जानकारी अभी तक आम है, संभवतः यह उससे असंख्य गुना आगे है। संवाददाताओं को उनके मतलब की खबर बनाकर देना, किसी पत्र के मजमून को ड्राफ्ट कर देना जैसे कार्य एआई की सबसे निचली योग्यता है। छात्रों को संगीत सिखाना भी कोई बड़ी बात नहीं है।अक्षर ज्ञान होना और किसी विषय का विद्वान होना अलग-अलग बातें हैं। क्या एआई किसी छात्र को संगीत का विद्वान बना सकेगा? इस प्रश्न का उत्तर एआई से संगीत सीखने वाले छात्र भविष्य में देंगे।हो सकता है यह ऐसा हो जैसा कुछ ऐप के जरिए किसी प्रचलित गीत के संगीत के साथ उस गीत के बोलों को गाने वाले को स्वयं के मौहम्मद रफी, किशोर कुमार या लता मंगेशकर होने का भ्रम हो जाता है।फिलहाल एआई से हमारी अपेक्षा मनुष्य के स्थान पर मशीन से काम लेने तक ही हैं।समय के साथ हम एआई के आश्रित होते जाएंगे और तब संगीत किसी घराने की पहचान या विरासत न रहकर एआई का उत्पादन बन जाएगा। मशीनों से हमारा जीवन आसान हुआ है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और अन्य नव विकसित आधुनिक नगरों का इतना तेज विकास मशीनों के अभाव में संभव नहीं था। मनुष्य के नियंत्रण और निर्देशन में चलने वाली मशीनें मानव जाति के कल्याण का साधन बन जाती हैं।जिन मशीनों से मानव नियंत्रित और निर्देशित होने लगे, उनसे मानव सभ्यता स्वयं को कैसे बचा पाएगी? यह प्रश्न एआई द्वारा छात्रों को केवल संगीत की शिक्षा देने के संकट तक सीमित नहीं है। इस प्रश्न का संबंध मनुष्य के आविष्कारक होने से आलसी और पराधीन हो जाने के संकट से है। मनुष्य की उपलब्धि उसके पीढ़ी दर पीढ़ी परिष्कृत होते आ रहे संस्कार हैं, उसकी नित नया करने की जिज्ञासाएं हैं और सामाजिक, पारिवारिक बंधनों में रहने के बावजूद एक मनुष्य के तौर पर स्वतंत्र रहने में है।एआई इन सभी उपलब्धियों की निरंतरता के लिए संकट बन सकता है।(नेक दृष्टि)l
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