_-राजेश बैरागी-_
ग्रेटर नोएडा की एक सोसायटी में आतंक का पर्याय बने उल्लुओं के जोड़े और उनके बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ दिया गया है। यह कार्य महत्वपूर्ण होने से अधिक रोचक था। उल्लुओं के आक्रामक होकर लोगों पर लगातार आक्रमण करने की संभवतः यह पहली ज्ञात घटना हो सकती है। उल्लू बेहद शर्मीला जानवर माना जाता है। इसीलिए वह दिन के उजाले में बामुश्किल ही दिखाई पड़ता है। दीपावली के अवसर पर काली कमाई के अभिलाषी मनुष्यों द्वारा उल्लू को खोजकर उसकी पूजा अभ्यर्थना करने का रिवाज है। हालांकि उल्लू में यह गुण होता तो वह अपने जीवन को सुख समृद्धि से भर सकता था। उल्लू की उपस्थिति को नकारात्मक मानने वालों की भी कमी नहीं है। जहां उल्लू रहता है,उस वृक्ष के उजड़ने की आशंका रहती है। हालांकि जैसे शेर को स्वयं के जंगल का राजा होने का पता नहीं होता, वैसे ही उल्लू को स्वयं के शुभ अशुभ होने का भी शायद ही पता होता हो। परंतु इस पोस्ट को लिखने का उद्देश्य किसी प्रकार भी उल्लू पुराण बांचना नहीं है बल्कि रेस्क्यू नहीं किए गए और हर सरकारी विभाग में छिपे बैठे उल्लुओं को उजागर करना है।दिन में अपने कर्तव्यों से आंखें मूंदकर रहने वाले सरकारी कर्मचारी क्या उल्लुओं से कम हैं। बिल्डरों, भूमाफियाओं, ठेकेदारों को काली कमाई कराने के साधन बने सरकारी कर्मचारी उल्लुओं से किस प्रकार उन्नीस हैं। केवल एक जोड़ा वयस्क और पांच चूजे उल्लुओं को पकड़कर जंगल में छोड़कर आने वाले वन विभाग के कर्मचारी यदि इसे अपनी उपलब्धि मानें तो मानें, तंत्र में घुसे उल्लू ऐसी उपलब्धियों को ठेंगे पर रखते हैं।(नेक दृष्टि)
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