(यात्रा वृत्तांत) *वंदे भारत*

_-राजेश बैरागी-_

क्या आराम से बैठकर सौ डेढ़ सौ किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ा जा सकता है? इस विसंगत प्रश्न का उत्तर वंदे भारत जैसी आधुनिक सेमी हाई स्पीड रेलगाड़ियां हैं जिनकी गति का कोई प्रभाव अंदर वातानुकूलित वातावरण में आरामदायक कुर्सियों पर बैठे यात्रियों पर बिल्कुल भी नहीं पड़ता। यात्री तेजी से दौड़ती रेलगाड़ी के भीतर चाय नाश्ता करने के साथ समाचार पत्र और मोबाइल पढ़ते रह सकते हैं।आज सुबह हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से खजुराहो जाने वाली 22470 वंदे भारत रेलगाड़ी के सी-14 डिब्बे में हमारी सीट संख्या 18-19 आरक्षित थी।साथी पत्रकार डॉ देवेंद्र शर्मा ने टिकट आरक्षित कराते समय अपना नाम पहले रखा।जेन जी की असल समस्या यही है।ये लोग अपने से वरिष्ठ लोगों को उपेक्षित कर आगे बढ़ना चाहते हैं। इस अवसर पर मुझे एक पुरानी लघु कथा स्मरण हो आती है जिसमें दुनियादारी की जिम्मेदारियों से विमुख एक युवक एक साधू की शरण में पहुंचता है और एक दो दिन के प्रशिक्षण के बाद भिक्षा मांगने के लिए अपना कमंडल साधू से आगे रख देता है। वंदे भारत ने निर्धारित समय प्रातः छः बजे हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से प्रस्थान कर दिया। यात्रियों को सबसे पहले पानी की बोतल, फिर समाचार पत्र और उसके बाद चाय नाश्ता वितरित किया गया। अधिकांश यात्री खुद में या अपने मोबाइल फोन में व्यस्त रहे। इक्का दुक्का छोड़कर किसी ने समाचार पत्र खोलकर भी नहीं देखा। डिब्बे के ठीक बीच में सेंटर टेबल के दोनों ओर आमने-सामने बैठे कुछ यात्री आपस में पर्यावरण को लेकर बातें कर रहे थे जिन्हें धीरे से बोलने के बावजूद पूरे डिब्बे में सुना जा सकता था। अब रेलगाड़ियां भी लोगों के बीच होने वाली बातचीत के मामले में मौन हो गई हैं। मोबाइल ने लोगों की जिह्वा पर लगाम लगा दी है। हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन छोड़ने के साथ मुझे बारापूला नाला दिखाई दिया था।इसकी आयु चार पांच सौ बरस बताई जाती है।मुगल शासक जहांगीर ने इस पर बारह मेहराबों वाला पुल बनवाया था जिससे इसका नाम बारापूला पड़ा। इसमें से बेहद गंदा, सड़ांधयुक्त और गहरे काले रंग का कीचड़ जैसा पानी बहता है। यह यमुना में गिरता है। मुझे नहीं पता कि यमुना में गिरने से पहले इस नाले के पानी का कोई उपचार होता है और यदि होता है तो उसे कितनी ईमानदारी से किया जाता है। हमने वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि झांसी तक वंदे भारत की सेवा ली।कुल मिलाकर यह एक अच्छी रेलगाड़ी है। इसके शौचालय साफ सुथरे होने के बावजूद प्रशंसा के योग्य नहीं लगे। हालांकि आधुनिक शौचालयों को प्रयोग करने की योग्यता भी सभी यात्रियों की नहीं होने से भी समस्या उत्पन्न होती है। शताब्दी रेलगाड़ियों के मुकाबले वंदे भारत बहुत अलग नहीं है,गति के मामले में भी। फिर भी इसका यात्री किराया उसके मुकाबले लगभग डेढ़ गुना होता है।रेलवे लाइन के दोनों ओर हरियाली और कृषि योग्य भूमि देखना अच्छा लगा। हालांकि समय के साथ कब विकास की बयार इस नयनाभिराम भू आकृति को औद्योगिक इकाइयों की भेंट चढ़ा देगी, कौन जाने।(नेक दृष्टि)(ऐसे ही अन्य समाचारों आलेख के लिए हमारी वेबसाइट www.nekdristi.com देखें)

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