मेरी गोरखपुर यात्रा (4) *राजनीतिक रुझान: रोजगार, विकास, भ्रष्टाचार को लेकर नाराजगी है परंतु जाएं तो कहां*

_-राजेश बैरागी-_

गोरखपुर में 9 विधानसभा सीटें हैं और सभी भाजपा के कब्जे में हैं।2027 का विधानसभा चुनाव सामने है और भाजपा एक बार फिर यहां सभी सीटों पर कमल खिलाने की तैयारी कर रही है।सदर सीट से विधायक योगी आदित्यनाथ राज्य के मुख्यमंत्री हैं। उन्हें यहां के लोग महाराज कहकर पुकारते हैं। महाराज ने इस जनपद का खूब विकास कराया है। खूब निवेश लाया जा रहा है, खूब औद्योगिक इकाइयां स्थापित कराई जा रही हैं, सड़क, हाइवे, अस्पताल बनाए गए हैं। रोजगार की क्या स्थिति है? यहां स्थापित हो रही औद्योगिक इकाइयों में स्थानीय लोगों को आसानी से रोजगार नहीं मिलता। कुछ दिनों पहले दादरी(गौतमबुद्धनगर) के विधायक तेजपाल सिंह नागर ने मुख्यमंत्री की बैठक में नोएडा,ग्रेटर नोएडा, यमुना प्राधिकरण क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों में स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से रोजगार देने की मांग की थी। उनकी इस मांग को सख्ती से खारिज कर दिया गया था। दरअसल पूंजीपति यहां तक कि विदेशी कंपनियां जहां औद्योगिक इकाइ लगाते हैं, वहां के लोगों की स्थानीय आक्रामकता से बचने के लिए उन्हें अपने यहां रोजगार देने से बचते हैं। इससे समूचे देश के कामगार अपने घरों से दूर दूसरे स्थानों पर प्रवासी बनकर रोजगार करते हैं।गीडा में भूमि देने वाले गांवों के अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूर बन गए हैं। औद्योगिक इकाइयों में जिन्हें काम मिला है,उन्हें भी न्यूनतम वेतन नहीं मिलता। गोरखपुर और आसपास भूजल पीने योग्य नहीं है। लोगों ने या तो अपने घरों में जल शोधन यंत्र लगा लिये हैं या खरीदकर पानी पीते हैं। नोएडा की भांति मकान किराए का धंधा यहां भी बढ़ रहा है। बाहर से आने वाले श्रमिक किराए के मकान में ही रहते हैं। सेक्टर के निकट भीटी रावत गांव ऐसा ही जैसे नोएडा का अट्टा गांव या ग्रेटर नोएडा का एच्छर गांव जहां स्थानीय लोगों की आबादी से अधिक बाहरी लोग किराए के मकानों में रहकर यहां की औद्योगिक इकाइयों में रोजगार कर रहे हैं।स्थानीय आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति में परिवर्तन की गति बहुत धीमी है।गोरखपुर नगर और बाहर जाने वाले मुख्य मार्गों पर बड़े बड़े ब्रांड के आउटलेट, होटल, ढाबे खुल रहे हैं। किसी क्षेत्र के औद्योगीकरण का यह भी एक प्रभाव होता है। सामान्य लोग निजी बातचीत में बताते हैं कि अखिलेश यादव कार्यकाल में थानों पर दबंगों के प्रभाव में रिपोर्ट दर्ज नहीं होती थी,अब पुलिस खुद से ही रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है। तहसील आदि सरकारी कार्यालयों में आम नागरिकों से जुड़े मामलों पर कार्रवाई की दयनीय स्थिति से भी लोग नाखुश हैं।भाजपा और सपा दोनों राजनीतिक दलों के लोग एक ही स्थान पर मिल जाते हैं और अपनी अपनी पसंद की पार्टियों के पक्ष में लड़ने पर भी उतारु हो जाते हैं। हालांकि सपा के समर्थक थोड़े तर्क वितर्क के बाद मैदान छोड़ देते हैं। उन्हें मालूम है कि झगड़ा बढ़ने पर नुकसान उन्हीं का होगा। वर्तमान में तो उनके समर्थन में कोई दबंग भी नहीं आएगा। समाप्त (नेक दृष्टि)

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