*एयरपोर्ट में जलभराव और नशे में पायलट*

_-राजेश बैरागी-_

बारिश के दौरान कहीं पानी इकट्ठा हो जाना क्या कोई बड़ी बात है?चाहे वह हवाई अड्डे के भीतर ही क्यों न इकट्ठा हो गया हो। बड़ी बात है उसका ढीठ की तरह उसी स्थान पर जमा रहना।जल भराव और जल जमाव में यही मौलिक अंतर है। जेवर एयरपोर्ट नया नया चालू हुआ है। उसमें मौजूद समस्याएं उजागर हो रही हैं और उनका निराकरण भी हो रहा है। मीडिया में प्रचार होना अलग बात है परंतु किसी भी हवाई अड्डे को पूरी क्षमता के साथ चलने में समय लगता है। दिल्ली के बरअक्स जेवर में हवाई अड्डा बनाना आसान था, चलाना मुश्किल होगा बशर्ते कि कुछ स्थानों के लिए उड़ानें केवल यहीं से ही उड़ें। मैं बीते शुक्रवार को इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर था। वहां हवाई जहाज से यात्रा करने वाले लोगों का हमेशा मेला लगा रहता है। जेवर स्थित नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को वहां तक पहुंचने के लिए एक लंबा समय लगेगा।आज उसके आगमन और प्रस्थान बोर्ड पर मात्र आठ उड़ानें प्रदर्शित हो रही थीं। इस एयरपोर्ट के चलने और वहां बारिश के दौरान कुछ समय के लिए किसी स्थान पर पानी भर जाना कोई विशेष घटना नहीं है। विशेष घटना है, पायलट का गांजा पीकर हवाई जहाज चलाना और उसके समर्थन में पायलट एसोसिएशन का यह झूठ फैलाना कि जहाज में तकनीकी खामी थी।हवा में पतंग की भांति उड़ते हवाई जहाज में बैठे यात्रियों और क्रू मेंबर्स के जीवन की डोर थामने वाले पायलट को क्या नशे में रहकर यह जिम्मेदारी उठानी चाहिए? यदि नेतृत्व गांजा के नशे में होगा तो किसी भी व्यवस्था को टर्बुलेंस में फंसने से कौन बचा सकता है?(नेक दृष्टि)

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