*यह नोएडा-वह नोएडा*

_-राजेश बैरागी-_

मैं आज सुबह लगभग साढ़े पांच बजे दिल्ली जाते हुए नोएडा से गुजरा। नोएडा मेरे लिए बिल्कुल नया नहीं है। पिछले लगभग 33 वर्षों से मैं नोएडा समेत समूचे गौतमबुद्धनगर जनपद की पत्रकारिता के माध्यम से सेवा कर रहा हूं। परंतु इतने सुबह नोएडा की सड़कों पर चलने का यह अनुभव थोड़ा अलग था। गौड़ सिटी चौक से हिंडन नदी सेतु पार करने के बाद शुरू होने वाले नोएडा की विसंगत तस्वीर सामने आती है।बायीं ओर कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बहुमंजिली इमारतें हैं तो दाईं ओर बहुमंजिला हाउसिंग सोसायटी दिखाई देती हैं। इसके बाद खुद ब खुद बेढब तरीके से बढ़ते चले गए गांव, अवैध बैंक्वेट हॉल और न जाने क्या क्या अनियोजित विकास दिखाई देता है। यहां एक प्रश्न दिल्ली के मुकाबले नोएडा कहां ठहरता है? आंकड़ों के अनुसार दिल्ली 1484 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ एक ऐतिहासिक नगर है जबकि नोएडा मात्र 203 वर्ग किलोमीटर में सिमटा एक नया बसाया हुआ नगर है। नोएडा वास्तव में दिल्ली का एक उपग्रह नगर है जैसे गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत। दिल्ली के मुकाबले ये सभी उपग्रह नगर कहीं नहीं ठहरते परंतु लोग अब दिल्ली छोड़कर यहां बस रहे हैं या बसने की हसरत रखते हैं। मैं वापस आज सुबह नोएडा से गुजरने के दौरान हुए अनुभव पर लौटता हूं। फिल्म सिटी से डीएनडी फ्लाईओवर पर चढ़ने तक सड़क का जो दृश्य था, नयनाभिराम था।लग ही नहीं रहा था कि यह उसी नोएडा का हिस्सा है जिसमें मामूली सी बारिश में सड़कें डूब जाती हैं, वाहन रेंगने लगते हैं और शहर जैसे ठहर सा जाता है।कल नोएडा प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निजी बातचीत में कहा कि यहां नाले नालियों को दुरुस्त रखने के लिए नितांत अलग अभियांत्रिकी विभाग बनाया जाना चाहिए। हालांकि उनका यह सुझाव तभी कारगर हो सकता है जब विभाग अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ईमानदारी से करें, अन्यथा विभागों की क्या कमी है?(नेक दृष्टि)

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