
_-राजेश बैरागी-_
जसवंत सिंह खालड़ा और सरदार भगत सिंह में क्या कोई समानता हो सकती है? हालांकि सत्ता के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने वाले ऐसे और भी अनेक लोग इन दोनों शहीदों से समानता रखते हैं जिन्हें हम नहीं जानते हैं और जो समय की धूल के नीचे दफन हैं। अपने एक पारिवारिक मित्र किरपाल सिंह के अचानक गायब होकर फिर उसकी लाश मिलने से शुरू हुई जसवंत सिंह खालड़ा की लड़ाई उन पच्चीस हजार से अधिक लोगों की न्यायेत्तर हत्या की जांच तक पहुंची जिन्हें पंजाब पुलिस ने आतंकवाद की आड़ में मात्र प्रोन्नति पाने का माध्यम बनाया था। क्या पंजाब में एक दशक से भी अधिक समय तक चला आतंकवाद वास्तव में वैसा नहीं था जैसा हम सुनते सुनाते आए हैं? क्या वहां पुलिस को मिले असाधारण अधिकारों ने खालिस्तान की मांग को लेकर शुरू हुए आंदोलन को एक अलग ही रूप दे दिया था। प्रमाण बताते हैं कि अपने गलत कार्यों में साथ न देने वाले दो हजार से अधिक साथी पुलिसकर्मियों को भी पंजाब पुलिस ने नृशंसता से मार डाला था। क्या यह अनुमान करना सहज हो सकता है कि पुलिस जब चाहे जिस किसी भी नागरिक की जान ले ले और कहीं कोई सुनवाई न हो? पंजाब में उस समय यही हो रहा था। आतंकवाद के नाम पर किसी भी नागरिक को जीने के अधिकार से वंचित किया जा सकता था। तत्कालीन पंजाब सरकार और केंद्र सरकार ने पंजाब को पुलिस स्टेट बनने दिया और उसके विरुद्ध आवाज उठाने वाले जसवंत सिंह खालड़ा भी अंतरराष्ट्रीय पहचान के बावजूद अपनी जान बचाने में सफल नहीं हो सके। क्या उन्हें भगतसिंह जैसा शहीद नहीं माना जाना चाहिए? अभी भगतसिंह भी शहीद का दर्जा पाने की प्रतीक्षा में हैं तो जसवंत सिंह को कैसे मिल सकता है। माचिस नामक हिंदी चलचित्र ने पंजाब में जिस पुलिस आतंकवाद का मामूली सा चेहरा दिखाया था, सतलुज उसके पूरे और घिनौने चेहरे को पूरी तरह उजागर करती है। आज मैंने यह चलचित्र देखा।(नेक दृष्टि)
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