
_-राजेश बैरागी-_
यह महज़ संयोग ही था कि विश्व योग दिवस और चिकित्सा की सर्वाधिक प्रचलित एलोपैथी विधा के लिए योग्य उम्मीदवारों के चयन की परीक्षा नीट एक साथ हुए। एक अनुमान के अनुसार देशभर में कल लाखों स्थानों पर योग शिविर आयोजित किए गए जबकि नीट परीक्षा 5454 केंद्रों पर शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। गड़बड़ी के चलते नीट परीक्षा एक महीने के अंतर से आज दोबारा आयोजित की गई थी और इसे सुरक्षित व शांतिपूर्ण कराने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया था।योग शिविरों के लिए भी ऐसा ही किया गया। देशभर में भाजपा शासित राज्यों की संख्या 22 है। वहां योग सरकार और भाजपा संगठन द्वारा पूरे मनोयोग से किया गया। हालांकि योग शिविरों में योग करने वालों की संख्या बहुत अधिक दिखाई नहीं दी और जो लोग आए भी उन्हें योग से कम और योग शिविर में आने वाले सत्ताधारी विशिष्ट लोगों के समक्ष उपस्थित होने से अधिक मतलब था। मैं कल मुजफ्फरनगर में एक रेस्टोरेंट सह रिसॉर्ट में आयोजित योग शिविर का साक्षी बना। वहां उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के काबीना मंत्री अनिल कुमार जाटव मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। शिविर में कोई पचास लोगों की उपस्थिति थी। योग करने वालों के लिए उच्च स्तरीय चाय नाश्ता लगाया गया था। क्या उन्हें इसके बजाय नारियल पानी और जूस नहीं दिया जाना चाहिए था? इस प्रश्न को अप्रासंगिक मानकर छोड़ देते हैं।अगला प्रश्न यह है कि क्या नीट और योग में कोई अंतर्संबंध हो सकता है? दोनों ही मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हितकर हैं। एम्स दिल्ली जैसे संस्थान अनियंत्रित रोगों का उपचार योग में खोज रहे हैं।योग जीवनशैली होना चाहिए।इसे मन से अपनाए जाने की आवश्यकता है। एलोपैथी चिकित्सा आवश्यकता है और इसे स्वस्थ जीवन के लिए और अधिक उपयोगी बनाया जाना चाहिए। हालांकि एक सच यह भी है कि एलोपैथी चिकित्सा से बचने के लिए योग करने पर जोर दिया जाता है। यह योग की विशेषता के लिए नहीं बल्कि उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए किया जाता है। किसी भी उपयोगी विधा को केवल बिक्री या दिखावे से लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता है। इसी प्रकार किसी लोकप्रिय विधा जैसे एलोपैथी को लूट मचाने का साधन भी नहीं बनने देना चाहिए।(नेक दृष्टि)
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