रामलीला वर्सेज व्यापार मेला 

राजेश बैरागी।कार्तिक नवरात्रों के दौरान व्यापार मेले का आयोजन क्या एक सही निर्णय है? उत्तर प्रदेश सरकार की पहल पर ग्रेटर नोएडा के एक्सपो मार्ट में पिछले दो वर्षों से आयोजित किए जा रहे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेले का तीसरा संस्करण फिलहाल अपनी पूरी रवानी पर है। शनिवार को यहां सवा लाख से अधिक लोगों ने अपनी चरण धूली डाली। लेन-देन,खरीदारी कितने की हुई,यह एक अलग विषय है। दरअसल इस प्रकार के मेले व्यापार की श्रृंखला के प्रदर्शन स्थल के तौर पर आयोजित होते हैं। इसमें विभिन्न उत्पादों का प्रदर्शन है, नवाचार से परिचय है और परस्पर व्यापार की संभावनाएं हैं।इसी समय कदम कदम पर रामलीलाओं के मेलों की भी धूम मची हुई है।यह आस्था और परंपराओं से जुड़े मेले हैं।इन आयोजनों में आस्था है, परंपरा है, व्यापार है और अपनी सामाजिक पहचान बनाने का अवसर है। क्या व्यापार मेला रामलीला के मेलों के लिए चुनौती पेश कर रहा है? यदि शनिवार को व्यापार मेले में आए सवा लाख लोग यहां न आए होते तो उनमें से आधे या दो तिहाई लोग अवश्य ही किसी रामलीला मेले की शोभा बढ़ा रहे होते। यदि इस समय रामलीलाएं न चल रही होतीं तो निश्चित ही व्यापार मेले में आने वाले विजीटर्स की संख्या दो से तीन गुना होती। हालांकि रामलीला और व्यापार मेले में आने वाले अधिकांश लोग मात्र दर्शक होते हैं। उनके आने न आने का अंतर केवल इतना ही होता है कि यदि वे न आते तो मेले की सफलता के मापदंड बदल जाते। मुझे लगता है कि दर्शकों के दृष्टिगत भी मेलों के आयोजनों में तिथि और समय का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। इससे दर्शकों को तो सुविधा रहती ही है, मेले के आयोजकों को भी दर्शकों के आने की चिंता नहीं रहती। एक ही समय पर बॉलीवुड भी अपनी महत्वाकांक्षी फिल्मों के प्रदर्शन से परहेज़ करता है

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