नोएडा प्राधिकरण में जनसुनवाई:चार दिन में ही ऊबने लगे अधिकारी

राजेश बैरागी।अपने अनुभव के आधार पर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकारी संस्थानों में होने वाली जनसुनवाई और तहसील दिवस जैसे आयोजन मात्र दिखावा (आईवॉश) हैं या जनता के बीच तंत्र को लेकर पनपने वाले गुस्से को शांत करने के लिए सेफ्टी वॉल्व। फिर भी नोएडा प्राधिकरण के नवनियुक्त मुख्य कार्यपालक अधिकारी कृष्णा करुणेश द्वारा पिछले सप्ताह से प्रत्येक कार्य दिवस में शुरू की गई जनसुनवाई की व्यवस्था इसलिए प्रशंसा के योग्य है कि इसका नेतृत्व एक अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी करता है और उसके साथ अमूमन सभी विभागों के प्रमुख अधिकारी उपस्थित रहते हैं। मौके पर ही कुछ मामलों का निस्तारण भी किया गया है।पिछले चार कार्य दिवसों में लगभग 100 फरियादी जनसुनवाई में पेश हुए हैं जिनमें से लगभग आधे लोग अपने अड़ोस-पड़ोस के विवाद लेकर आए। ऐसे फरियादी जनसुनवाई के महत्व को कम करते हैं। परंतु शेष लोग वर्षों से लंबित अपने मामलों को लेकर हाजिर हुए। ऐसे भी लोग आए हैं जिन्हें प्राधिकरण के अधिकारी अपने निजी लाभ के लिए चक्कर लगवा रहे हैं। प्राप्त होने वाली सभी शिकायतों को एक रजिस्टर में दर्ज किया जा रहा है और इसकी निगरानी स्वयं मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा की जा रही है। परंतु इस जनसुनवाई को लेकर दो तरह की चर्चा प्राधिकरण अधिकारियों में चल रही हैं। अधिकांश अधिकारी इस व्यवस्था से खुश नहीं हैं। उन्हें सुबह से दोपहर एक दो बजे तक फरियादियों की प्रतीक्षा में बैठना अच्छा नहीं लग रहा है।उनका तर्क है कि इससे उनका दैनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है।दूसरे अधिकारी वो हैं जिन्हें ऐसी व्यवस्था से परहेज़ रहता है।वे जो करते हैं उसे ही उचित मानते हैं और जो नहीं करते हैं उसके लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानते हैं। संपत्तियों के हस्तांतरण आदि कार्य इसी श्रेणी में आते हैं। बीते कल यमुना प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी राकेश कुमार सिंह ऐसे ही एक मामले में अपने मातहत अधिकारियों द्वारा दो महीने तक निर्णय नहीं लेने से हैरान थे। नोएडा प्राधिकरण में भी यह एक आम समस्या है। बीते गणतंत्र दिवस पर गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष नंदकिशोर कलाल ने प्राधिकरण के अधिकारियों कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा था कि ऐसा नहीं लगना चाहिए कि ये प्राधिकरण केवल धनवान लोगों के लिए बनाए गए हैं। यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की समस्या को ध्यानपूर्वक सुना जाना चाहिए और उसका समाधान होना चाहिए। यदि वास्तव में ऐसा होने लगे तो जनसुनवाई जैसे प्रहसन,क्षमा करें,आयोजन प्रतिदिन करने की क्या आवश्यकता है? क्यों नहीं अधिकारियों कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर उन्हें जवाबदेह बनाया जाना चाहिए? यह सब भी करके देखा जा चुका है, जनसुनवाई भी करके देख लेते हैं

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