राजेश बैरागी।आखिरकार जिला जज गौतमबुद्धनगर को यह क्यों कहना पड़ा कि अदालतें कमिश्नरेट पुलिस के हिसाब से नहीं चलेंगी और इस तल्ख टिप्पणी के साथ धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों में जेल में बंद चार अभियुक्तों को जमानत दे दी क्योंकि संबंधित जांच अधिकारी दरोगाओं ने बार बार तलब करने के बावजूद अदालत के समक्ष इन अभियुक्तों के संबंध में कोई रिपोर्ट पेश नहीं की।
रोजाना की भांति चल रही जिला जज गौतमबुद्धनगर श्री अतुल श्रीवास्तव की अदालत में कल उस समय सन्नाटा छा गया जब जिला जज ने कमिश्नरेट पुलिस के रवैए पर कठोर टिप्पणी करते हुए धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों में जेल में बंद चार अभियुक्तों को जमानत दे दी। जिला जज ने साफ कहा,- अदालतें थानों की मर्जी से नहीं चलेंगी।’ इसके साथ ही उन्होंने जिला शासकीय अधिवक्ता के माध्यम से कमिश्नरेट पुलिस प्रमुख को पुलिस की मुकदमों में गैर गंभीर पैरवी के लिए कड़ा पत्र भी लिखा। दरअसल इन मामलों में अदालत द्वारा पिछले लगभग एक महीने से पुलिस से निरंतर रिपोर्ट तलब की जा रही थी परंतु पुलिस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। एक मामले में तो जांच अधिकारी दरोगा ने केवल पहला पर्चा पेश किया जिसमें आमतौर पर प्राथमिकी में लिखी बातों को ही दोहराया जाता है। क्या इन मामलों में संबंधित जांच दरोगाओं ने अभियुक्तों के साथ सांठगांठ कर उन्हें जमानत मिलने का रास्ता आसान किया है? इस प्रश्न का उत्तर तो वो जांच दरोगा ही दे सकते हैं।उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक की पहल पर समूचे राज्य के जिलों की पुलिस द्वारा ‘ऑपरेशन कनविक्शन’ के तहत न्यायालयों में विचाराधीन मुकदमों में पैरवी कर दोषसिद्धि कराई जाती है। गौतमबुद्धनगर कमिश्नरेट पुलिस भी इस अभियान में पीछे नहीं है। इस वर्ष 2026 में अभी तक दो महीने से भी कम समय में हत्या जैसे जघन्य अपराध में शामिल पांच लोगों को आजीवन कारावास की सजा दिलवाई गई है जबकि एक गैंगस्टर को पांच वर्ष तथा बाल यौन शोषण के एक आरोपी को दस वर्ष कारावास समेत कुल दस अपराधियों को सजा दिलवाई गई है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि बार बार मांगने के बावजूद जेल में बंद आरोपियों से संबंधित पुलिस रिपोर्ट नहीं मिलने पर अदालत को बिना गुण-दोष पर विचार किए जमानत देने पर विवश होना पड़ रहा है।
जिला अदालत बनाम गौतमबुद्धनगर कमिश्नरेट पुलिस:जिला जज ने पुलिस पैरवी के अभाव में दे दीं चार जमानत











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