यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण:24 साल बनाम 25वां साल- औद्योगिक इकाइयों की स्थापना में अभूतपूर्व वृद्धि

राजेश बैरागी।उत्तर प्रदेश के तीन महत्वपूर्ण औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में से एक यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) का यह रजत जयंती वर्ष है। पच्चीस वर्ष पूर्व स्थापित इस प्राधिकरण की सबसे बड़ी उपलब्धि ग्रेटर नोएडा के विख्यात परी चौक से आगरा तक बना देश का पहला एक्सप्रेस-वे है जो आज उत्तर प्रदेश की जीवनरेखा बन गया है। इसके अलावा इस प्राधिकरण की क्या उपलब्धियां हैं जिन्हें पच्चीस वर्षों में किए गए प्रयासों का परिणाम माना जाए? इस प्राधिकरण क्षेत्र में आजकल एक चर्चा यह भी है कि पिछले एक वर्ष में क्या कुछ ऐसा हुआ है जो पिछले पच्चीस वर्षों के मुकाबले अधिक है। इस चर्चा का आधार प्राधिकरण क्षेत्र में पिछले एक वर्ष में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना में आई अभूतपूर्व तेजी को बताया जा रहा है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो पता चलता है कि इस दौरान औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और उनके क्रियाशील होने में तेजी से वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए मार्च 2025 तक क्षेत्र में 3039 औद्योगिक इकाइयों को भूमि आवंटित की गई थी जो अब बढ़कर 3113 हो गई है। इनमें से मार्च 2025 तक 1632 औद्योगिक इकाइयों की लीज डीड की गई थी जो अब 2363 है। इनमें से 990 के मुकाबले अब 1785 कंपनियों को मौके पर कब्जा दिया जा चुका है।तब 318 कंपनियों के नक्शे पास किये गये थे।अब इनकी संख्या 716 है।उस समय 120 कंपनियां निर्माणाधीन थीं,अब 341 कंपनियों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। मार्च 2025 तक क्षेत्र में केवल 9 कंपनियों ने उत्पादन शुरू किया था जिनकी संख्या अब 33 हो गई है। दरअसल जुलाई 2025 में नियुक्त हुए मुख्य कार्यपालक अधिकारी राकेश कुमार सिंह ने औद्योगिक इकाइयों की स्थापना पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने कंपनियों को आवंटित भूमि पर कब्जा देने में आ रही समस्याओं को दूर करने के लिए आठ नोडल अधिकारी नियुक्त किए। किसानों के मुआवजे,सात प्रतिशत आबादी भूखंड, उनके पुनर्वास के साथ अदालतों में चल रहे मुकदमों को समाप्त करने के लिए विशेष प्रयास किए गए। इसके साथ ही स्थलीय विकास कार्यों में तेजी लाई गई। इसके बावजूद कंपनी लगाने में विलंब करने वाले उद्यमियों से न केवल सीधे बातचीत की गई बल्कि उन्हें नियमानुसार कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई। कंपनी लगाने में अनिच्छुक कुछ आवंटियों के भूखंड निरस्त करने की कार्रवाई भी की गई।मुख्य कार्यपालक अधिकारी राकेश कुमार सिंह हालांकि इस उपलब्धि का श्रेय अकेले लेने के बजाय प्राधिकरण के सभी अधिकारियों कर्मचारियों के प्रयासों को देते हैं।वे इसे 1991 में तत्कालीन कार्यवाहक प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के ‘चालीस साल बनाम चार महीने’ जैसे अतिशयोक्ति पूर्ण नारे की तर्ज पर ‘पच्चीस वर्ष बनाम आठ महीने’ कहने से भी बचते हैं।उनका मानना है कि पूर्व के अधिकारियों द्वारा किए गए सद्प्रयासों की पुख्ता जमीन पर ही यह उपलब्धि हासिल हुई है जो आने वाले एक दो वर्षों में इस क्षेत्र के अभूतपूर्व औद्योगीकरण तथा रोजगार सृजन की पहचान भी बनेगी।

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