खाद्य सुरक्षा विभाग की उपस्थिति में नकली और मिलावटी खानपान के सामान की बिक्री

राजेश बैरागी।जनपद गौतमबुद्धनगर समेत सभी जनपदों में होली का त्योहार निकट होने के चलते खाद्य सुरक्षा विभाग प्रतिदिन नकली और मिलावटी खाद्य पदार्थों की पकड़ धकड़ कर रहा है। क्या सामान्य दिनों में खान-पान के सामान में नकल, मिलावट और घटतौली नहीं होती है? यह सही है कि त्योहारों विशेष तौर पर हिंदू त्योहारों के अवसर पर खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों की बाढ़ आ जाती है। हालांकि यह प्रतिदिन मिलावट करने वालों का ही रौद्र रूप होता है। क्या कोई अचानक मिलावट कर सकता है? खाद्य पदार्थों में मिलावट करने की प्रवृत्ति सदियों पुरानी है।एक बादशाह के शासनकाल में दिल्ली में एक दरोगा के कोडों की आवाज बाजार में एक कोने से दूसरे कोने तक सुनी जाती थी।वह दरोगा मिलावट और घटतौली करने वाले दुकानदारों के प्रति बहुत निर्दयी बताया जाता है। उसके बाद से आज तक मिलावटी खाने-पीने के सामान की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है बल्कि उत्तरोत्तर वृद्धि ही हुई है। सस्ते के नाम पर बिकने वाला खाद्य पदार्थ नकली और मिलावटी नहीं है तो और क्या है? जनपद का खाद्य सुरक्षा विभाग ऐसे लोगों पर कार्रवाई के लिए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। परंतु सीमित संसाधनों और जेबें भरने की नीयत वाला यह विभाग किसी भी जनपद में अपमिश्रित खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाने में नाकाम ही रहता है। जनपद गौतमबुद्धनगर में हाल ही में कुट्टू का आटा खाने से सैकड़ों लोगों की जान सांसत में आ गई थी। उक्त कुट्टू के आटे का उत्पादन चिपियाना गांव में किया जा रहा था। यह गांव गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद की सीमा पर स्थित है। दोनों जिलों की बिजली आदि कई सुविधाएं साझी चलती हैं।इसी का लाभ उठाकर यह कुट्टू आटे की उत्पादन इकाई गाजियाबाद में पंजीकृत थी और गौतमबुद्धनगर खाद्य विभाग को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी।दूसरे जनपदों से आने वाले नकली पनीर आदि को गुप्त सूचना पर पकड़ लेने वाला खाद्य सुरक्षा विभाग अपने यहां चलने वाली खाद्य पदार्थ उत्पादन इकाइयों को नहीं जानता। ऐसा हो सकता है। संसाधनों का अभाव भी एक बड़ा कारण है। परंतु क्या खुलेआम परचून, मिठाई आदि दुकानों पर बिक रहा अधोमानक खाने-पीने के सामान को रोकने के लिए भी गुप्तचरों की सहायता की आवश्यकता है? विश्व के उन्नत देशों में वहां के नागरिक खानपान के सामान की गुणवत्ता को लेकर निश्चिंत रहते हैं। भारत में यह सबसे बड़ी चुनौती है। यहां ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों के नाम पर खूब लूट मच रही है। अच्छा खाना खाने का दावा करने वाले लोग साथ में अपने अहंकार का भी प्रदर्शन करते हैं। यह अलग बात है कि जिसे वह सीना तानकर अच्छा खाना कह रहे होते हैं उसकी गुणवत्ता का दावा कंपनी द्वारा लिफाफे पर किए गए दावे से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।संबंधित जनपद का खाद्य सुरक्षा विभाग ऐसे दावों की सत्यता प्रमाणित करने का कोई जोखिम तब तक नहीं उठाता जब तक कि उसके खाने से कोई बीमार न पड़ जाए या किसी की मौत न हो जाए

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