राजेश बैरागी।क्या दिल्ली और आसपास के लोगों ने यहां व्याप्त वायु प्रदूषण से पार पाने का उपाय खोज लिया है? मैं एक बार फिर अपनी इस पोस्ट में अपने पसंदीदा मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता के अमर नायक गिलगमेश का जिक्र करना चाहूंगा। उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के दुर्लभ प्रयास किए थे।सुना जा रहा है कि गोवा में पर्यटकों की भारी भीड़ जमा हो गई है। मसूरी, नैनीताल, शिमला, मनाली पूरी तरह भर गये हैं और अब केवल उन्हीं लोगों को वहां जाने की अनुमति मिल रही है जिनके पास होटलों की बुकिंग है। मुन्नार जैसे दूरस्थ पर्यटक स्थलों में भी पर्यटकों की संख्या रिकॉर्ड तोड़ रही है। वरिष्ठ स्तंभकार पत्रलेखा चटर्जी ने इस सप्ताह एक लेख में बताया है कि फेफड़ों की रक्षा के लिए दिल्ली और आसपास के बहुत से लोग पहाड़, समुद्र और जंगलों की ओर जा रहे हैं।मेक माई ट्रिप जैसे पर्यटन बुकिंग प्लेटफॉर्मों को इस बार वायु प्रदूषण से घबराये हुए बहुत से लोगों से धंधा मिला है। पत्रलेखा चटर्जी ने ऐसे लोगों को ‘प्रदूषण शरणार्थी’ के अनोखे नाम से संबोधित किया है। ऐसे कितने लोग हैं जो तीन चार दिन से एक अधिकतम सप्ताह से अधिक अपने घर से दूर रह सकते हैं?काम धंधा, नौकरी छोड़कर केवल फेफड़ों की रक्षा के लिए दिन दो चार बाहर रहने से क्या वायु प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है? मैं वापस गिलगमेश की मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की कथा पर लौटता हूं।उसे कहा गया था कि समुद्र की अतल गहराइयों में जाकर एक औषधि लाने से अमरता प्राप्त की जा सकती है। उसने वही किया परंतु अंततः उसे इस संसार की नश्वरता के ज्ञान से संतोष करना पड़ा। क्या दिल्ली और आसपास के लोगों की वायु प्रदूषण से मुक्ति के लिए की जा रही यह यात्राएं अंततः उन्हें ‘जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां’ जैसे ज्ञान के साथ वापस लौटा लाएगी? मुझे लगता है कि वायु प्रदूषण से कुछ दिनों के लिए भागने की अपेक्षा इसे न्यूनतम करना ज्यादा उचित होगा। और यह किया जा सकता है
प्रदूषण शरणार्थी कहां चले?









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