राजेश बैरागी-।वादी जो गवाह भी था, ने अपनी गवाही में स्पष्ट कहा था कि उसके पुत्र के हत्यारों को वह नहीं जानता है। उसने हत्यारोपियों को पहचानने से भी इंकार कर दिया था। उसने प्रथम सूचना रिपोर्ट जो उसने स्वयं लिखवाई थी में घटना का प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे को भी खारिज कर दिया था। फिर ऐसा क्या हुआ कि उसने कोर्ट से कहा कि वह अपनी गवाही फिर से दर्ज कराना चाहता है। और दूसरी बार गवाही में उसने न केवल अपनी पहली गवाही को पूरी तरह पलट दिया बल्कि हत्यारोपियों से अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग भी कर ली। कोर्ट ने सरकार को उसे सुरक्षा प्रदान करने का आदेश भी जारी कर दिया। यह कहानी किसी फिल्म की नहीं है। यह किसी ड्रामे का हिस्सा भी नहीं है। यह वास्तविक घटना गौतमबुद्धनगर जिला न्यायालय की एक कोर्ट में चल रहे हत्या के एक मुकदमे की सच्ची कहानी है। गौतमबुद्धनगर कमिश्नरेट पुलिस के एक थाना क्षेत्र में एक युवक की हत्या का मुकदमा इस कोर्ट में विचाराधीन है। हत्यारोपी मृतक के परिजनों के परिचित ही हैं।मृतक के पिता ने थाने पर नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी। कोर्ट में विचारण शुरू हुआ तो गवाह के तौर पर पेश हुए मृतक के पिता ने अभियोजन की मेहनत पर पानी फेर दिया। उसने घटना का प्रत्यक्षदर्शी होने और हत्यारोपियों को पहचानने जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों से स्पष्ट इंकार कर दिया। इसके बाद एक रील सामने आई। इस रील या वीडियो फुटेज में हत्या का सजीव ब्यौरा दर्ज बताया गया है। वीडियो फुटेज देखने के बाद पिता की आत्मा जाग उठी या उसका भय दूर हुआ कि उसने कोर्ट से पुनः गवाही देने की गुहार लगाई। कोर्ट की अनुमति से उसने पुनः गवाही दर्ज कराई। इसके साथ ही उसने हत्यारोपियों से जान का खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की। मुख्य गवाही दो बार होने और दोनों बार परस्पर विरोधी बातें कहने का इस मुकदमे के परिणाम पर होने वाले असर के बारे में तो कानूनविद ही अंदाजा लगा सकते हैं परंतु हत्या जैसे मामलों में मृतक के पिता का घटना को झुठला देने की विवशता को समझने के लिए कानून व्यवस्था और सामाजिक दखलंदाजी का अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए
गौतमबुद्धनगर जिला न्यायालय:हत्या के मामले में मृतक के पिता की दो बार गवाही









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