राजेश बैरागी।आम और खास लोगों का जीवन विशुद्ध रूप से दो भागों में बंट गया है। आप या तो सोशल मीडिया पर हैं या फिर आप असामाजिक हैं। असामाजिक होते हुए भी सामाजिक दिखाई देने के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना आवश्यक है। कल्पना कीजिए जो लोग पहली बार इस तथाकथित सोशल मीडिया से परिचित होते हैं, उनके जीवन में अचानक कैसे कैसे बदलाव आते हैं। अपने समय की चर्चित हिंदी फिल्म ‘संन्यासी’ की नायिका पर फिल्माए गए उस गीत को याद कीजिए जिसके बोल हैं,-मुझे नींद नहीं आती, मुझे चैन नहीं मिलता।’ सोशल मीडिया ऐसी ही बला का नाम है। इस पर एक बार सक्रिय होने के बाद मन और तन बेचैन रहने लगता है। कोई दवा, कोई सलाह, कोई डांट फटकार काम नहीं आती। किसी ने हास परिहास में कहा कि पूजा करने के बाद आदमी सबसे पहले अपने सोशल मीडिया अकाउंट को ऐसे चैक करता है कि उसने अभी जो प्रार्थना की थी, भगवान ने उसकी स्वीकृति का ओटीपी भेजा होगा। यह बैंक अकाउंट से अधिक महत्व का हो गया है।सोशल मीडिया पर आदमी मन मुताबिक रोल करता है और ट्रोल होता है।रोल कोई और करे तो भी ट्रोल हो जाता है। आदमी सोशल मीडिया छोड़ने की धमकी देता है तो उसे मनाने वाले भी सोशल मीडिया पर ही प्रकट होते हैं। कुछ दिन दूर रहने के बाद बेचैन आत्मा फिर सोशल मीडिया पर लौट आती है तो सभी राहत की सांस लेते हैं। ऐसी सामाजिक समरसता पहले कभी देखने में नहीं आयी जब किसी को सामाजिक रूप से खदेड़ा गया हो और वापस लौटने पर उसका हृदय की गहराइयों से स्वागत किया गया हो। यह सोशल मीडिया ही है जिसपर मित्रता की सौगंध खाने की अनिवार्यता नहीं है। यहां मित्र होने के लिए नैतिक होना भी आवश्यक नहीं है। यहां दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा जैसी निराशा का भी कोई स्थान नहीं है।यह स्वयं को पेश करने का सर्वोच्च साधन है। यह अलग बात है कि आपकी पेशी को सोशल मीडिया फ्रेंड कैसे लेते हैं। सोशल मीडिया एक अनंत संभावनाओं वाला मंच है। सुखी हों या दुखी, प्रसन्न हों या खिन्न। अंततः लौटकर यहीं आना पड़ेगा। यहां आने के सिवा मोक्ष भी तो नहीं मिलती।(
सोशल मीडिया से दूरी सही न जाए









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