एक दूजे के लिए’ से एक दूसरे पर निर्भर न होने तक 

राजेश बैरागी।स्त्री पुरुष (पति-पत्नी) संबंध को लेकर मैं जब भी विचार करता हूं तो इस रिश्ते की गहराई और ऊंचाई की लंबी यात्रा में हांफने लगता हूं। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने अपने समक्ष आए एक मामले में पत्नी के इस दावे को ठुकरा दिया कि वह अपने पति पर निर्भर नहीं है या निर्भर नहीं रहना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी दोनों एक दूसरे पर निर्भर होते हैं और जिन्हें यह निर्भरता स्वीकार नहीं है उन्हें विवाह के बंधन में नहीं बंधना चाहिए।क्या पत्नी के कहने का अर्थ उसकी स्वतंत्रता से था?या वह यह बताना चाहती थी कि वह अपने पति पर बोझ नहीं है? दरअसल पति-पत्नी संबंध को मैंने हमेशा एक ‘दूजे के लिए’ माना है।यह किसी का बोझ किसी पर होने, किसी पर किसी की निर्भरता होने, किसी की स्वतंत्रता किसी के अधीन होने, कोई किसी का स्वामी और दूसरा उसका दास होने का संबंध नहीं है। जहां स्त्री पुरुष नहीं हैं केवल पुरुष पुरुष ही हैं या स्त्री स्त्री ही हैं वहां भी अधिकारी कर्मचारी,बॉस और मातहत, किसी की सीमित स्वतंत्रता किसी के अधीन होने और किन्हीं मामलों में एक सीमा तक निर्भरता भी होती ही है। यह व्यवस्था की आवश्यकता है। पति-पत्नी संबंध भी व्यवस्था की आवश्यकता से बंधे होते हैं। क्या यह संबंध केवल इतना ही होता है? तो ‘एक दूजे के लिए’ होने का क्या अर्थ है?जब कभी भी स्वयं को ऐसा लगता है कि मैं अधूरा या अधूरी हूं तो केवल एक वही स्त्री या पुरुष का स्मरण आता है जिसे पति या पत्नी कहा जाता है। यदि किसी जोड़े के बीच इस संबंध में किसी प्रकार की सड़न पैदा हो गई हो तो इससे स्त्री पुरुष (पति-पत्नी) संबंधों की गहराई या ऊंचाई कम नहीं होती। इस महान संबंध को लेकर कोई क्षुद्र परिभाषा भी नहीं गढ़ी जा सकती है।(

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *